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Friday, September 15, 2023

क्या मैं आज़ाद हूँ

व्यथित हूँ , व्याकुल हूँ मैं 
कहीं गहरे अंतस में सुलग़ रहे 
बवंडर में लुप्त हूँ मैं 

जाने कैसी जवाबदेही के बेड़ियों में 
कैदियों की तरह जकड़ी हुई हूँ मैं 

जाने कैसा अविज्ञात बोझ अपने सीने पर 
हाँकती हुई, बस मूक बैठी हूँ मैं 

जाने क्यों अपनी अनगिनत अपेक्षाओं का नितप्रति 
प्रमुदित हो, कण्ठ घोंट रही हूँ मैं 

नजाने कब तक ऐसा ही चलेगा ये सिलसिला 

अपने अन्तर्मन में उठ रही इच्छाओं , अभिलाषाओं , प्रेरणाओं  को 
जाने कब तक पंख न दे पाऊँगी मैं 
जाने कब तक खुल के ना  जी पाऊँगी मैं 
जाने कब तक न उड़ पाऊँगी  मैं 

या फिर कहीं  ऐसा तो नहीं 

ये बेड़ियाँ , या बंदिशें, ये  क़ैद  
मैंने स्वयं  ही चुनी हों , खुद के लिए 
शायद मैंने ही "मैं " को "मैं " से जकड़ रखा हो  

और यदि ये सच है तो 

इस बेनाम, बेमतलब, बन्धन से, इस भार से 
मुझे स्वयं को मुक्त करना होगा 
मुझे स्वयं ही अपने पंखों से उड़ना सीखना होगा 
मुझे स्वयं ही "मैं" को "मैं" की जकड़न से आज़ाद करना होगा 
मुझे स्वयं ही, अपनी ही बनाए कारागृह  को 
अग्नि के सुपुर्द करना होगा 

खुद से वचबद्ध होना होगा 
की अब न कोई बंधन, न बाधा , न बेड़िया मेरे लिए  हैं 
अब यदि कुछ है तो 
नीले गगन में उड़ती हुई आज़ाद सिर्फ "मैं" 
मेरा अस्तित्व  और  मेरा स्वाभिमान है 



- डॉ त्रिपत मेहता 

Tuesday, September 12, 2023

विरासत

ना कुछ मेरा है, ना कुछ तेरा है

बस जो है, वो यहीं से लिया है

और यहीं पर देना है

तो फिर किस बात का अभिमान है, झूठी शान है और नकली इंसान है

भौतिक सुखों की अभिलाषा से क्या होगा

होना तो वही है जो माथे पे लिखा होगा

तू कर्म भूमि के पथ पर

कर्म करता चल निरन्तर

तू ठहर मत, तू रुक मत, तू झुक मत, तू थक मत, तू डर मत, तू सोच मत

तू अपने मार्ग पर उद्दंड चलता चल

कल क्या होगा, ये तू कल पर छोड़ दे

तू तो बस आज का गीत गुनगुनाता चल

और यदि कुछ संचय करना ही है 

तो ऐसी जागीर का कर

जो अनमोल है, अविकारी है, अमर है

जो मर कर भी साथ जानी है

और जो सदा सर्वदा साथ रहनी है

वो वही है

जो  पार्वती का शिव है

जो मीरा का कृष्ण है

जो लक्ष्मी का गणेश है

जो सीता का राम है

और जो राधा का श्याम है

वही तो हमारा भी असली धाम है

तो क्यों न आज से अभी से 

कुछ ऐसा कायदा कायम करें

की अबकी बार जो जाएं

तो फिर बहुरी वापिस ना आएं 


डॉ त्रिपत मेहता

नजाने क्यों

 नजाने क्यों, सब को सब कुछ पाने की होड़ लगी है नजाने क्यों, सब को सबसे आगे निकलने की होड़ लगी है जो मिल गया है, उसको अनदेखा कर दिया है और जो...