बड़े सुहाने दिन थे वो जब ज़िन्दगी
सिर्फ़ मेरे लिए, किसी हसीन अफ़साने से कम न थी
जब उगते हुए सूरज की हर किरण
सिर्फ़ मेरे लिए, अपने साथ हजारों रंग लिए आती थी
जब पड़ोस में मुर्गा सुबह सुबह
सिर्फ़ मेरे लिए, जोर से बांग देता था
जब बागीचे का फूल फूल
सिर्फ़ मेरे लिए, खुशबू बिखेरा करता था
जब गर्मी की तेज धुप को चीरते हुए बादल
सिर्फ़ मेरे लिए, जी भर कर बरसते थे
जब खुले निर्मल आकाश में इन्द्रधनुष
सिर्फ़ मेरे लिए, रंगों की बौछार करता था
जब गली में खेलते हुए बच्चों में से मेरी माँ
सिर्फ़ मेरे ही चेहरे पर, खुशी को नाचते हुए देखा करती थी
सच...ये कायनात अज़ब सुंदर थी
जब मैं बच्ची थी...
Thursday, August 27, 2009
Wednesday, August 5, 2009
वही डगर...
आज क्यों बदली बदली सी है
वही राहे...
जो कभी अपनी हुआ करती थी
लगाव तो आज भी उतना ही है
फिर क्यों अपनी हो कर भी डगर अनजानी सी लगती है
आज वही मेघ छाए है गगन में
फिर क्यों बरखा का पानी बेगाना सा लगता है
वही मौसम, वही रुत, वही आलम है
फिर क्यों आज सच भी अफसाना सा लगता है
खुशिया आज भी बाहे फैलाए स्वागत कर रही है
फिर क्यों इक अनजाना सा भय खाए चला जा रहा है
या कुछ नही...ये डगर है उस तक पहुँचने की
शायद इसी लिए राह की हर सीडी परीक्षा बनती चली जा रही है...
वही राहे...
जो कभी अपनी हुआ करती थी
लगाव तो आज भी उतना ही है
फिर क्यों अपनी हो कर भी डगर अनजानी सी लगती है
आज वही मेघ छाए है गगन में
फिर क्यों बरखा का पानी बेगाना सा लगता है
वही मौसम, वही रुत, वही आलम है
फिर क्यों आज सच भी अफसाना सा लगता है
खुशिया आज भी बाहे फैलाए स्वागत कर रही है
फिर क्यों इक अनजाना सा भय खाए चला जा रहा है
या कुछ नही...ये डगर है उस तक पहुँचने की
शायद इसी लिए राह की हर सीडी परीक्षा बनती चली जा रही है...
Friday, July 10, 2009
एक बीमार सोच
पुरूष और नारी मिलकर समाज की रचना करते है। समाज के निर्माण के लिए जितना पुरूष जिम्मेवार है उतनी ही नारी भी। फिर क्यों सदियों से नारी अपने अरमानो को सूली से टंगती हुई आ रही है, क्यों सदा से ही नारी को तुच्छ समझा जाता है। प्रकृति ने भी नारी को पुरूष से एक कदम आगे रखा है...संतान पैदा करने का सामर्थ्य प्रदान किया है। आज विधान सभा में नारी को ३३% आरक्षण देने की बात करते है, आख़िर क्या साबित करना चाहते है, की ये नारी का सम्मान कर रहे है, उसे आगे आने का मोका दे रहे है। अरे ईश्वर ने भी सृष्टि की रचना के लिए नारी और पुरूष का ५०% चुना है...फिर क्यों ये पुरूष प्रधान समाज नारी को उसका ५०% अधिकार नही दे सकता?
मगर ये क्या जाने नारी की मनो - स्तिथि को। हर रोज , हर कदम पर जाने किस - किस चुनौती का सामना करती है। दिन रात इक नई कसौटी पर मुस्कुराते हुई तराजू में तौलती है ख़ुद को। नारी के जीवन पर चार लफ्ज़ लिख डाले और समझ लिया की जान गए इसे अच्छी तरह..इसी भ्रम में है वो लोग , जो ये दावा करते है की वो इसकी तकलीफ से रु-ब-रु है। इतना आसान नही है नारी के अस्तित्व को जानना और समझना। यदि नारी को समझना है, उसे सही शब्दों में पिरोना है, तो ख़ुद नारी का जीवन जी कर देखो। (बहुत आसान है लिखना- की नारी जीवन में बहुत से किरदार निभाती है और सफल भी होती है)। नारी की सहेनशीलता को शब्द नही दिए जा सकते। ईश्वर ने जाने किस मिटटी से बनाया है इसे, की हर तूफ़ान को इक नई चुनौती समझ कर , उसे जान कर, उसे स्वीकार कर, चुपचाप अपने अन्दर समेट लेती है। कोई क्या जाने की ये अन्दर से कितनी डरी हुई होगी...कभी किसी ने भी इसकी मनो-स्तिथि को समझने की कोशिश ही नही की। यदि वास्तव में कोई इसे समझना चाहता तो इस पर भिन्न - भिन्न प्रकार ki कविताए लिखने की बजाए इसके अस्तित्व की रक्षा करने में जुटा हुआ दिखाई देता। अफ़सोस सिर्फ़ और सिर्फ़ इसी बात का है की इस पर दया का भाव दिखाने वाले तो करोडो मिल जाते है, लेकिन इसके लिए, इसके अधिकार के लिए कोई भी आगे आने को तैयार नही है॥
स्वार्थी है आज का समाज। यह पुरूष प्रधान समाज एक औरत को कभी भी उन्नति करता हुआ नही देख सकता। आज देश में कितनी है ऐसी प्रतिभाशाली औरतें है जो लोक लाज के भय से अपने अपने घरों में छुपी बैठी है।
समाज लोगो से बनता है - हम तुम जैसे लोगो से...लेकिन आज लोगो की सोच बेईमानी हो गई है। बेईमान लोगो से बना हुआ आज का समाज खोखला हो चुका है। एक ऐसा समाज जिसके तत्व न तो स्वयम ही उन्नति करना चाहते है और न दूसरो को करते देख सकतें है।
स्वर्गवासी श्री आंबेडकर जी ने सही कहा है - "भारत भाग्य विधाता"। भारत का भाग्य उस विधाता के हाथों में ही है..लेकिन इश्वर भी उसी की सहायता करते है जो स्वयं अपनी सहयता करना चाहता है ..और यहाँ तो सहायता करने की बजाए एक दूसरे के अस्तित्व को जी जान से मिटाने में लगे है...
मगर ये क्या जाने नारी की मनो - स्तिथि को। हर रोज , हर कदम पर जाने किस - किस चुनौती का सामना करती है। दिन रात इक नई कसौटी पर मुस्कुराते हुई तराजू में तौलती है ख़ुद को। नारी के जीवन पर चार लफ्ज़ लिख डाले और समझ लिया की जान गए इसे अच्छी तरह..इसी भ्रम में है वो लोग , जो ये दावा करते है की वो इसकी तकलीफ से रु-ब-रु है। इतना आसान नही है नारी के अस्तित्व को जानना और समझना। यदि नारी को समझना है, उसे सही शब्दों में पिरोना है, तो ख़ुद नारी का जीवन जी कर देखो। (बहुत आसान है लिखना- की नारी जीवन में बहुत से किरदार निभाती है और सफल भी होती है)। नारी की सहेनशीलता को शब्द नही दिए जा सकते। ईश्वर ने जाने किस मिटटी से बनाया है इसे, की हर तूफ़ान को इक नई चुनौती समझ कर , उसे जान कर, उसे स्वीकार कर, चुपचाप अपने अन्दर समेट लेती है। कोई क्या जाने की ये अन्दर से कितनी डरी हुई होगी...कभी किसी ने भी इसकी मनो-स्तिथि को समझने की कोशिश ही नही की। यदि वास्तव में कोई इसे समझना चाहता तो इस पर भिन्न - भिन्न प्रकार ki कविताए लिखने की बजाए इसके अस्तित्व की रक्षा करने में जुटा हुआ दिखाई देता। अफ़सोस सिर्फ़ और सिर्फ़ इसी बात का है की इस पर दया का भाव दिखाने वाले तो करोडो मिल जाते है, लेकिन इसके लिए, इसके अधिकार के लिए कोई भी आगे आने को तैयार नही है॥
स्वार्थी है आज का समाज। यह पुरूष प्रधान समाज एक औरत को कभी भी उन्नति करता हुआ नही देख सकता। आज देश में कितनी है ऐसी प्रतिभाशाली औरतें है जो लोक लाज के भय से अपने अपने घरों में छुपी बैठी है।
समाज लोगो से बनता है - हम तुम जैसे लोगो से...लेकिन आज लोगो की सोच बेईमानी हो गई है। बेईमान लोगो से बना हुआ आज का समाज खोखला हो चुका है। एक ऐसा समाज जिसके तत्व न तो स्वयम ही उन्नति करना चाहते है और न दूसरो को करते देख सकतें है।
स्वर्गवासी श्री आंबेडकर जी ने सही कहा है - "भारत भाग्य विधाता"। भारत का भाग्य उस विधाता के हाथों में ही है..लेकिन इश्वर भी उसी की सहायता करते है जो स्वयं अपनी सहयता करना चाहता है ..और यहाँ तो सहायता करने की बजाए एक दूसरे के अस्तित्व को जी जान से मिटाने में लगे है...
Saturday, May 30, 2009
द्वन्द
अपने ही विचारों की दल दल में
कहीं गुम सी होती चली जा रही हूँ मैं
डर है कहीं ख़ुद के ही अस्तित्व को
न खो बैठूं मैं
पता नहीं ये डगर किस ओर ले जा रही है
या ख़ुद इसी राह से लिपटी चली जा रही हूँ मैं
है मंजिल कहाँ , कहाँ ठिकाना है, कुछ ख़बर नही
बस
सूखे पत्ते की तरह हवा में बहती चली जा रही हूँ मैं
मलिन हो गया है अंतर्मन या नही सुनाई देती आत्मा की आवाज़
आज उज्जवल दृश्य नही देख पा रही हूँ मैं
मन के पर्दे पर अठखेलियाँ करते भिन्न भिन्न रंगों में से
सफ़ेद रंग को पा लेने की आरजू करती चली जा रही हूँ मैं
ये कैसी दुविधा है, कैसा फ़साना है
की लोग कहतें है
आंखों से ही सब बयान करे जा रही हूँ मैं
कहीं गुम सी होती चली जा रही हूँ मैं
डर है कहीं ख़ुद के ही अस्तित्व को
न खो बैठूं मैं
पता नहीं ये डगर किस ओर ले जा रही है
या ख़ुद इसी राह से लिपटी चली जा रही हूँ मैं
है मंजिल कहाँ , कहाँ ठिकाना है, कुछ ख़बर नही
बस
सूखे पत्ते की तरह हवा में बहती चली जा रही हूँ मैं
मलिन हो गया है अंतर्मन या नही सुनाई देती आत्मा की आवाज़
आज उज्जवल दृश्य नही देख पा रही हूँ मैं
मन के पर्दे पर अठखेलियाँ करते भिन्न भिन्न रंगों में से
सफ़ेद रंग को पा लेने की आरजू करती चली जा रही हूँ मैं
ये कैसी दुविधा है, कैसा फ़साना है
की लोग कहतें है
आंखों से ही सब बयान करे जा रही हूँ मैं
Thursday, April 30, 2009
किस और...किसकी तरफ़....और क्यों ???
आज एक बार फ़िर से
वही दौर आया है...
वो फ़िर से हर गली मुहल्ले में
अपनी आवाज़ घर घर बिखेरते
नज़र आने लगे...
फ़िर से वही नकली, झूठी
दिल को दिलासा देने वाली दलीलें
शहर के हर मोड़ पर सुनाई देने लगी....
दलील है..वोट दो...
उसे नही...मुझे दो...
सोच में पढ़ गई हू
किसे दू और किसे नही....
कौन साचा है कौन झूठा...
कौन देश की उन्नति के लिए सहभागी है
और कौन नही...
अपने ही विचारों में उलझ सी गई हू...
इस जन्तो जेहेन में फंस गई हू
न ख़ुद के साथ और न ही
समाज के साथ
न्याय नही कर पा रही हू
वो कहतें है आपका वोट कीमती है...
पर सबको पता है
परदे के पीछे यही वोट बिकता है...
आम आदमी को कौन पूछता है
उन्हें तो सिंघासन चाहिए
और उन्हें मिल भी जाएगा...
आम आदमी से ही खरीदा हुआ
झूठे दिलासे दे कर
सिंघासन....
हैरान हू
की हम सच में अभी तक
आजादी के बासठ सालों के बाद भी
आँखें खोल कर सो रहे है....
या कभी जागना चाहते ही नही...
वही दौर आया है...
वो फ़िर से हर गली मुहल्ले में
अपनी आवाज़ घर घर बिखेरते
नज़र आने लगे...
फ़िर से वही नकली, झूठी
दिल को दिलासा देने वाली दलीलें
शहर के हर मोड़ पर सुनाई देने लगी....
दलील है..वोट दो...
उसे नही...मुझे दो...
सोच में पढ़ गई हू
किसे दू और किसे नही....
कौन साचा है कौन झूठा...
कौन देश की उन्नति के लिए सहभागी है
और कौन नही...
अपने ही विचारों में उलझ सी गई हू...
इस जन्तो जेहेन में फंस गई हू
न ख़ुद के साथ और न ही
समाज के साथ
न्याय नही कर पा रही हू
वो कहतें है आपका वोट कीमती है...
पर सबको पता है
परदे के पीछे यही वोट बिकता है...
आम आदमी को कौन पूछता है
उन्हें तो सिंघासन चाहिए
और उन्हें मिल भी जाएगा...
आम आदमी से ही खरीदा हुआ
झूठे दिलासे दे कर
सिंघासन....
हैरान हू
की हम सच में अभी तक
आजादी के बासठ सालों के बाद भी
आँखें खोल कर सो रहे है....
या कभी जागना चाहते ही नही...
Tuesday, March 31, 2009
"शौषण"
सच कहा है ..
किसी के लिए कितना भी कर लो,
कम पढ़ ही जाता है...
मैंने पूरी जी जान लगा दी
अपना लक्ष दाव पर लगा दिया
कोई कसर नहीं छोडी
किसी को शिकायत का मौका भी नहीं दिया
ज्यादा नहीं चाहा था मैंने
तमन्ना, तमन्ना ही रह कर
कही दिल के किसी कोने में दब गई
कहाँ हुई गलती,
कहाँ हुई भूल,
की
फूल पाने की आरजू थी
और दामन में गिरे तो सिर्फ
बेवफाई के कांटे
नफरत की झंझोड़ देने वाली आंधी...
ऐ खुदा
बदल दे हालात मेरे...
अब ये आवाज़ नहीं निकलती दिल से
हिम्मत दे अपने चाहने वालो को
की तेरे ही बन्दों से मिली हुई
नफरत को
तेरा आशीर्वाद समझ लू...
किसी के लिए कितना भी कर लो,
कम पढ़ ही जाता है...
मैंने पूरी जी जान लगा दी
अपना लक्ष दाव पर लगा दिया
कोई कसर नहीं छोडी
किसी को शिकायत का मौका भी नहीं दिया
ज्यादा नहीं चाहा था मैंने
तमन्ना, तमन्ना ही रह कर
कही दिल के किसी कोने में दब गई
कहाँ हुई गलती,
कहाँ हुई भूल,
की
फूल पाने की आरजू थी
और दामन में गिरे तो सिर्फ
बेवफाई के कांटे
नफरत की झंझोड़ देने वाली आंधी...
ऐ खुदा
बदल दे हालात मेरे...
अब ये आवाज़ नहीं निकलती दिल से
हिम्मत दे अपने चाहने वालो को
की तेरे ही बन्दों से मिली हुई
नफरत को
तेरा आशीर्वाद समझ लू...
Sunday, March 22, 2009
"राहें"
आज ज़िन्दगी किस राह पर
ले जा रही है
जो कभी सोचा ना था
वो करवा रही है
और जो सोचा था
उसका तो
नामो निशाँ ही नही है
सावन भी बरस कर चल दिया
और कलि पर भी
पूरा यौवन आ गया
कायनात ने अपना नियम
अदा कर दिया
लेकिन
मेरा रास्ता क्यों बदल दिया
जो नही कर सकती थी
वो भी करवा दिया
और भरपूर करवाया की
शिकायत भी करने की
गुंजाइश न रही
ये "उसकी" कृपा थी
या
मेरा करम
की अपने "नसीब" से
मुझे "इशक" करवा दिया
ले जा रही है
जो कभी सोचा ना था
वो करवा रही है
और जो सोचा था
उसका तो
नामो निशाँ ही नही है
सावन भी बरस कर चल दिया
और कलि पर भी
पूरा यौवन आ गया
कायनात ने अपना नियम
अदा कर दिया
लेकिन
मेरा रास्ता क्यों बदल दिया
जो नही कर सकती थी
वो भी करवा दिया
और भरपूर करवाया की
शिकायत भी करने की
गुंजाइश न रही
ये "उसकी" कृपा थी
या
मेरा करम
की अपने "नसीब" से
मुझे "इशक" करवा दिया
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