चक्की के दो पाटो में पिस कर रह गया हू
यह रास्ता जाने कहा ले जाएगा।
न जाने कहा जा कर रुकेगा ये आंसुओं का सैलाब
थमेगा भी या नही कौन देख पाएगा।
Saturday, January 31, 2009
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नजाने क्यों
नजाने क्यों, सब को सब कुछ पाने की होड़ लगी है नजाने क्यों, सब को सबसे आगे निकलने की होड़ लगी है जो मिल गया है, उसको अनदेखा कर दिया है और जो...
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आज अचानक कहीं गहरे अंतस में उसी मंदिर कि घंटियाँ फिर से बजने लगी हैं और आरती सुनाई देने लगी है जब मैं और मेरी सहेलियाँ छुट्टी वाले द...
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चले आए हैं तेरे दर पे कि आज जाने कि जल्दी नहीं किसी कि नजरों का इंतज़ार बनें कि आज हमारे घर कोई नहीं हैं भटक राहों में दर बदर रहें कि ...
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