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सिसकते रिश्ते

काश की ऐसा हो पाता
कि शाखों से टूटे पत्ते
फिर से उन्ही टहनियों पर
लहरा पाते
काश की ऐसा होता
कि  टूटे हुए तारे
फिर से विशाल आकाश में
जगमगा पाते
काश की ऐसा होता
कि रिश्तों के टूटे हुए तार
फिर से अपने सांचे में ढल पाते
खिलखिला पाते
काश....
मगर ये हो न पाएगा
वक़्त का पहिया तो चलता ही
चला जाएगा
और अच्छा है की न  हो पाएगा
गुजरते समय के साथ
अहसास भी गुजर गए
ज़िन्दगी के रंगमंच पर
आज एक नया किरदार उभर कर आया है
जो बेफिक्र है , जो ताज़ा है
जो हिम्मती है, जो निडर है
जो ताक़तवर है, जो दमदार है
जो अति सुन्दर है , जो तृप्त है... 

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अनुभूति

आज अचानक कहीं गहरे अंतस में उसी मंदिर  कि घंटियाँ फिर से बजने लगी हैं और आरती सुनाई देने लगी है  जब मैं और मेरी सहेलियाँ छुट्टी वाले दिन बड़े ही चाव से बन-ठन के मंदिर जाया करती थी हर शाम घंटी बजने का  इंतज़ार किया करतीं थीं सच... आज़ाद परिंदा था मन उन दिनों जिसकी उड़ान की कोई सीमा नहीं थी, कोई निश्चित दिशा नहीं थी बिल्कुल आज़ाद, बंदिशों रहित, निर्मल, स्वच्छ आकाश में उड़ान भरने को सदा तत्पर... खुले-आम जी भर के जीने वाला चित... जिसका कही कोई मुकाबला ही नही था... लेकिन आज अगर ढूंढने भी निकलूँ, तो भी नहीं मिलता वो मंदिर कान मानो तरस रहें हों आरती की आवाज़ को... सहेलियों के भी धरौंदे टूटते समय न लगा और कच से टूट कर बिखर गए अब कोई राहगीर नहीं रहा राह में और मन.... मन जैसे प्रत्येक क्षण करहा रहा हो...छटपटा रहा हो... एक बार फिर से उसी गगन को चूमने को तरस रहा हो... मगर अफ़सोस उडारी भर न सकेगा इन बंदिशों, बेड़ियों, समाज की खोखली जंजीरों में बंध कर जो रह गया है न जी सकेगा, न मर सकेगा बस यूँ ही घुट-घुट कर आहें भर कर रह जाएगा... और इंतज़ार करेगा एक नई प्रभा

ग़ज़ल

तेरे हुस्न के तसव्वुर से रोशने-हयात हो गई  तेरी बख्शीश हुई, तो ये कायनात बहशत हो गई (तसव्वुर - ध्यान, हयात - ज़िन्दगी, बख्शीश - रहमत, कायनात - सृष्टि, बहशत - स्वर्ग ) चिरागे-ज़ीस्त को  तूने दिया है इक सूरज नया, तेरे ज़िक्र की कलंदरी में मेरी ज़ात फ़ना हो गई (चिरागे-ज़ीस्त - जीवन रुपी दीया, कलंदरी - मस्ती, ज़ात - अस्तित्व ) हो बैअत-ऐ-मुर्शिद चली मैं रूहानी राह पर, वसूल कर तेरे दीदारे-हक़ को मैं तारक हो गई (बैअत-ऐ-मुर्शिद - गुरु से दीक्षित, दीदारे-हक़ - दर्शन का अधिकार, तारक - त्यागी ) नफ्स को रौंद दिया आरिफ की पुर-लुत्फी ने, मकामे-हक़ की बंदगी ही बस, मेरी ज़िद्द हो गई (नफ्स - मन, आरिफ - अल्लाह का नाम लेने वाला, पुर-लुत्फी - आनंददायक, मकामे-हक़ - सतलोक ) है तेरी फेज़ से मेरी सबा हसीं, रज़ा में तेरी सजदा कर, मैं आलिफ हो गई (फेज़ - कृपा, सबा - प्रभात, रज़ा - मौज, सजदा - परमात्मा के आगे सर झुकाना, आलिफ - अल्लाह की एकता ) खत्म हो गया समां हुकूमते-आगही का, अल्ला-ताल्लाह से विसाल हुआ तो मैं "तृप्त" हो गई (हुकूमते-आगही - बुद्धि का शासन, अल्ला-ताल्लाह - परमात्मा,

दिले-बयाँ

नैन चक्षुओं को खुलना सिखा मौला, ज़र्रे-ज़र्रे में तेरे अक्स को देखना सिखा मौला कर्णों से सुनना सिखा मौला, कौने -कौने में तेरे नाम कि अपार चर्चा सुनना सिखा मौला नथनों से सूंघना सिखा मौला, सृष्टि के कण-कण में बसी तेरी मदमस्त सुगंधी में डूबना सिखा मौला कंठ को तेरी उस्तत करना सिखा मौला, हर लफ़्ज में तेरा ज़िक्र हो ऐसा कोई नायाब गीत सिखा मौला हस्त से लिखना सिखा मौला, कविता के प्रत्येक शब्द में तेरे नाम का गुण-गान करना सिखा मौला उदर कि क्षुदा को तड़पना सिखा मौला, तेरे ध्यान कि ऊर्जा से भूखे पेट को भरना सिखा मौला क़दमों को चलना सिखा मौला, सकल द्वार को छोड़ कर तेरे नूरे-द्वार पर रुकना सिखा मौला कामिनी को ख़सम होना सिखा मौला, जन्म-मरण के चक्रव्यूह से अब तो विश्राम करना सिखा मौला