Tuesday, September 12, 2023

विरासत

ना कुछ मेरा है, ना कुछ तेरा है

बस जो है, वो यहीं से लिया है

और यहीं पर देना है

तो फिर किस बात का अभिमान है, झूठी शान है और नकली इंसान है

भौतिक सुखों की अभिलाषा से क्या होगा

होना तो वही है जो माथे पे लिखा होगा

तू कर्म भूमि के पथ पर

कर्म करता चल निरन्तर

तू ठहर मत, तू रुक मत, तू झुक मत, तू थक मत, तू डर मत, तू सोच मत

तू अपने मार्ग पर उद्दंड चलता चल

कल क्या होगा, ये तू कल पर छोड़ दे

तू तो बस आज का गीत गुनगुनाता चल

और यदि कुछ संचय करना ही है 

तो ऐसी जागीर का कर

जो अनमोल है, अविकारी है, अमर है

जो मर कर भी साथ जानी है

और जो सदा सर्वदा साथ रहनी है

वो वही है

जो  पार्वती का शिव है

जो मीरा का कृष्ण है

जो लक्ष्मी का गणेश है

जो सीता का राम है

और जो राधा का श्याम है

वही तो हमारा भी असली धाम है

तो क्यों न आज से अभी से 

कुछ ऐसा कायदा कायम करें

की अबकी बार जो जाएं

तो फिर बहुरी वापिस ना आएं 


डॉ त्रिपत मेहता

Tuesday, August 22, 2023

फ़िल्हाल जी ले

ना ना  तुम मत रोको 
खुद को उड़ने से
ज़ंजीरो को तोड़ने से 
उड़ने दो खुद को, फ़ैला दो अपने पाँखो को 
ये मत सोचो की दुनिया क्या कहेगी 
दुनिया को अपना काम करने दो 
तुम अपना काम करो 
मत डालो भार अपने पंखों पर 
जी भर के उड़ान भरने दो इन्हें 
छू लेने दो इन्हें 
अपने हिस्से के आसमान को 
तुम तो बस उड़ो 
जितना चाहे उतना ऊँचा उड़ो 
खुल के जी लो
बटोर लो सारी खुशियाँ  
और बाँट दो अपने आस - पास 
हाँ तुम हो, तुम ही तो  हो जो 
जो अपनी कहानी खुद लिखोगे 
अपनी ज़िन्दगी के पन्नों को कोरा मत छोड़ो 
अपने मन के धरातल पर 
उभर रहे चित्र को 
तुम ही सजाओगे 
अपनी किस्मत के किरमिच पर 



डॉ त्रिपत मेहता 

Saturday, May 13, 2017

सिसकते रिश्ते

काश की ऐसा हो पाता
कि शाखों से टूटे पत्ते
फिर से उन्ही टहनियों पर
लहरा पाते
काश की ऐसा होता
कि  टूटे हुए तारे
फिर से विशाल आकाश में
जगमगा पाते
काश की ऐसा होता
कि रिश्तों के टूटे हुए तार
फिर से अपने सांचे में ढल पाते
खिलखिला पाते
काश....
मगर ये हो न पाएगा
वक़्त का पहिया तो चलता ही
चला जाएगा
और अच्छा है की न  हो पाएगा
गुजरते समय के साथ
अहसास भी गुजर गए
ज़िन्दगी के रंगमंच पर
आज एक नया किरदार उभर कर आया है
जो बेफिक्र है , जो ताज़ा है
जो हिम्मती है, जो निडर है
जो ताक़तवर है, जो दमदार है
जो अति सुन्दर है , जो तृप्त है... 

Tuesday, January 26, 2016

दासी



तेरे चरणों की दासी हूँ
करो कृपा हे प्रभू
तेरे दरस की प्यासी हूँ

"मैं" ना रहा अब कुछ नहीं शेष
तेरी कृपा से प्रभू
दासी ने पाया गुरु नरेश

राम नाम ही अौषध है
तेरा सुमीरन हे प्रभू
अात्मा का पोषण है

वाटिका का तू सुन्दर फूल
तेरा हर अादेश प्रभू
सर आँख पर है क़ुबूल

नाम ख़ुमारी चढ़े दिन रैन
प्रभू तेरे दर्शन को
तरसे मेरे दोनों नैन

राम रस से सदा रहूँ लिप्त
कृपािनधान प्रभू
यही चाहे दासी तृप्त 

Thursday, November 19, 2015

पिया मिलन का चाव



मोको पिया मिलन का चाव 
मैं बलिहारी राम की 
मैं बलिहारी राम की
मेरा दरद न जाने कोऊ  
मोको पिया मिलन चाव 
मेरा सतगुरु प्यारा 
मेरा सतगुरु न्यारा 

पीहू पीहू बोल्या पपीहा 
पीहू पीहू बोल्या पपीहा 
नईया पार लगाओ 
मोको पिया मिलन चाव 
मेरा सतगुरु प्यारा 
मेरा सतगुरु न्यारा 

कामिनी खसम को चाहे 
कामिनी खसम को चाहे 
बूँद बूँद अमृत बरसाओ 
मोको पिया मिलन चाव 
मेरा सतगुरु प्यारा 
मेरा सतगुरु न्यारा 

तन मन धन तुझको बेचेया 
तन मन धन तुझको बेचेया 
मन अब त्रिपत भया 
मोको पिया मिलन चाव 
मेरा सतगुरु प्यारा 
मेरा सतगुरु न्यारा 

Wednesday, March 6, 2013

अरमाँ

खुश हुआ है बहुत अंतर्मन
पर कहीं गहरे अंतस में
तीव्र उदासी भी है
नाच उठा है तन बदन
पर कही ख्वाबों की गली में
अखंड ठेहराव भी है
आशाओं से भर गया है मन
पर कहीं किसी धमनी में
अजीब सा खालीपन भी है
भानू की रोशनी से भरपूर है गगन
पर कहीं किसी कोने में
स्याह अँधेरा भी है
वर्षा की बूंदों से धरा है मगन
पर कही किसी कूचे में
बंजर सूखापन भी है
खुशियों ने थाम लिया है दामन
पर कहीं किसी रिश्ते में
नासूर गम के बादल भी हैं
शायद  इसी का नाम ज़िन्दगी है
हा इसी का नाम ज़िन्दगी है


Saturday, October 2, 2010

अनुभूति

आज अचानक
कहीं गहरे अंतस में
उसी मंदिर  कि घंटियाँ फिर से बजने लगी हैं
और आरती सुनाई देने लगी है 

जब मैं और मेरी सहेलियाँ
छुट्टी वाले दिन
बड़े ही चाव से बन-ठन के
मंदिर जाया करती थी
हर शाम घंटी बजने का 
इंतज़ार किया करतीं थीं

सच...
आज़ाद परिंदा था मन उन दिनों
जिसकी उड़ान की
कोई सीमा नहीं थी,
कोई निश्चित दिशा नहीं थी

बिल्कुल आज़ाद, बंदिशों रहित,
निर्मल, स्वच्छ आकाश में
उड़ान भरने को सदा तत्पर...
खुले-आम जी भर के जीने वाला
चित...
जिसका कही कोई मुकाबला ही नही था...

लेकिन आज अगर ढूंढने भी निकलूँ,
तो भी नहीं मिलता वो मंदिर
कान मानो तरस रहें हों आरती की आवाज़ को...

सहेलियों के भी धरौंदे टूटते समय न लगा
और कच से टूट कर बिखर गए

अब कोई राहगीर नहीं रहा राह में
और मन....
मन जैसे प्रत्येक क्षण
करहा रहा हो...छटपटा रहा हो...
एक बार फिर से उसी गगन को
चूमने को तरस रहा हो...

मगर अफ़सोस
उडारी भर न सकेगा
इन बंदिशों, बेड़ियों, समाज की खोखली जंजीरों में
बंध कर जो रह गया है

न जी सकेगा, न मर सकेगा
बस यूँ ही
घुट-घुट कर आहें भर कर रह जाएगा...

और इंतज़ार करेगा
एक नई प्रभात का
वाटिका में नई कोपलों के फूटने का
एक सुन्दर नवीन संसार का...

नजाने क्यों

 नजाने क्यों, सब को सब कुछ पाने की होड़ लगी है नजाने क्यों, सब को सबसे आगे निकलने की होड़ लगी है जो मिल गया है, उसको अनदेखा कर दिया है और जो...