Thursday, October 5, 2023

नजाने क्यों

 नजाने क्यों, सब को सब कुछ पाने की होड़ लगी है

नजाने क्यों, सब को सबसे आगे निकलने की होड़ लगी है

जो मिल गया है, उसको अनदेखा कर दिया है

और जो नहीं मिला है, उसको जीत जाने की होड़ लगी है

अपने हिस्से के आसमान को भुला दिया है 

और दूसरे की फलक को छीनने की होड़ लगी है

ख़ुद के कर्मों से बहुत कुछ बहुत सुंदर पा लिया है 

लेकिन फिर भी गैर के आगोश में समां जाने की होड़ लगी है 

नजाने क्यों...


डॉ त्रिपत मेहता 

निरन्तर प्रवाह

वो सरिता जो बह निकली है

विशाल पर्वत का सीना चीर कर

कल कल करती, जगह जगह कौतुहल करती

नाचती, गाती, गिरती, संभलती, 

नजाने क्या-क्या शरारतें करती

कहीं पूरे वेग से हल्ला मचाती हुई

राह में सब कुछ अपने साथ बहा कर ले जाती हुई

तो कहीं समुंद्र की गहराई की तरह एकदम शान्त

जन मानस की प्यास को बुझाती हुई

अपने अलग-अलग रूप को खुद स्वीकारती हुई

राह में आने वाली सारी बाधाओं स्वयं ही दूर करती हुई

बहती चली जा रही है

बिना किसी की परवाह किए

बिना किसी की राह देखे

बस अपनी धुन में

अपना गीत गुनगुनाते हुए

चलती चली जा रही है

बिना रुके, बिना डरे, बिना थके

अपने पी से मिलने

सदा सर्वदा के लिए

उसके साथ एक होने 

क्योंकि मिलन का आनंद तो सर्वोपरी है 

केवल तटिनी ही महसूस कर सकती है

मिलन के उस क्षण में जन्मे

आमोद को, तृप्ति को, संपूर्णता के भाव को


डॉ त्रिपत मेहता 

Tuesday, October 3, 2023

निजी फैसला

 सातों जहान क़दमों में होते हैं 

उस पल, जब हम तुम संग होते हैं 

 बंधन में चाहे हमें संसार ने बाँधा हो 

लेकिन एक दूसरे के सांचे में ढल कर, 

थोड़ा गिर कर, कुछ संभल कर 

एक दूसरे का ना केवल हमसफ़र 

बल्कि, हमकदम, हमजोली, हमसाया बनकर 

हाथों में हाथ डाल , साथ जीवन व्यतीत करने 

का निश्चय और वादा तो हमारा अपना है 


- डॉ त्रिपत मेहता 



नौंक झोंक

वो तुम ही हो न जो 

बात बात पर मुझसे लड़ते हो 

और फिर मुझे गलत ठहराकर 

खुद ही क्षमा भी मांग लेते हो। 


 वो तुम ही हो न जो 

मेरी छोटी-छोटी शरारतों का मज़ा भी लेते हो 

और फिर उतनी ही जल्दी 

चिढ़ भी जाते हो। 


 वो तुम ही हो न जो

जो बात-बात पर असहमति दिखाते हो  

और फिर अंत में मेरी ही बात को 

मान भी लेते हो। 


 वो तुम ही हो न जो

जो मेरे, तुम्हें बार-बार फ़ोन करने पर भड़क जाते हो 

और फिर फूलों का गुलदस्ता देकर 

प्रेम से मना भी लेते हो। 


 वो तुम ही हो न जो

जो मुझे आराम देने के लिए स्वादिष्ट पकवान पकाते हो 

और फिर रसोईघर में मचाए गंद को साफ़ करने के लिए 

 मुझे ही बुलाते हो। 


 वो तुम ही हो न जो

जो मुझे तंग करने के लिए कोई मौका नहीं छोड़ते हो 

और फिर खुद ही भले बनकर 

मान मनुहार भी कर लेते हो। 


 वो तुम ही हो न जो

जो मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हो 

और फिर मेरी सुरक्षा के लिए 

चिंतित भी रहते हो। 


 वो तुम ही हो न जो

मेरे किसी गंभीर कथन पर अचानक से ठहाका लगा देते हो 

और फिर उतनी ही परिपक़्वता से 

मामले को सुलझा भी देते हो। 


 वो तुम ही हो न जो

जो कभी कभी मुझसे खफा हो जाते हो 

और फिर मेरे थोड़ा सा मनाने पर 

झट से मान भी जाते हो। 


 हाँ प्रियवर वो तुम ही हो जो

 मेरे हम कदम हो 

आदि से अनंत काल तक 

सदा सर्वदा से मुझमें हो 

Thursday, September 21, 2023

फ़र्ज़ी रिश्ते

शुक्रिया हर उस शख़्स का  

जिसने पुरज़ोर कोशिश की 

मेरी हिम्मत तोड़ने की 

मुझे पीछे खींचकर गिराने की 


सच अगर उस दिन तुम न होते 

तो आज मैं  यहाँ ना  होती 

अपने सपने को साक्षात् ना  जी पा रही होती 


तुम तो किसी फ़रिश्ते से काम न निकले 

तुमने तो मुझसे "मैं " को मिलवा दिया 

चाहा तो था तुमने मेरे पँखों को काटना  

लेकिन मेरे ख़ुदा को ये गवारा  न था 

तुम्हारे हाथों  में  तलवार की बजाए 

मेरे लिए ऊपर उठने की सीढ़ी दे दी 

जिसकी तुम्हें भी शायद खबर न थी 

और मैं कदम दर कदम 

सीढ़ी दर सीढ़ी 

चढ़ती चली गई 

और अपने  स्वाभिमान की 

आन  बान  और शान को पहचानती गई 


तू है क्या    तू है क्या 


तुम्हारे मुख से निकली इस ध्वनि ने 

मानो मुझे नींद से जगा  दिया 

और सच में याद दिला दिया 

कि आख़िर मैं हूँ क्या 


 सच नमन तुम्हें दिल से 

तुम्हारी चरपरी ज़ुबाँ की बदौलत 

आज वो पा लिया और जी लिया 

जिसकी सदा से केवल कल्पना की थी 

जिसकी सदा से केवल तमन्ना की थी 


दिल से आभार, अभिनन्दन, अभिवादन  तुम्हारा 

मोती जो छिपा था सीप में गहरे कहीं 

तुमने न केवल उसे बहार निकला 

बल्कि चमका भी दिया 


बहुत बहुत मेहरबानी तुम्हारी 

जो कुटिल हुई वाणी तुम्हारी 

तुम्हारे इसी छल  ने मेरे अंदर 

उस ऊंघाई सी चिंगारी को सुलगा दिया 

और भयंकर बवंडर में बदल दिया 


अन्जाने में ही सही 

माँ शारदे के आशिर्वाद से 

मेरा अंतर्मन झंझोड़ दिया 

मेरी कलम को सक्रिय कर दिया 

मुझे मेरे ध्येय से मिलवा दिया 


प्रणिपात प्रणिपात  प्रणिपात 


डॉ  त्रिपत मेहता 

ग़ज़ल

हाँ मैंने देखा है 

मदमस्त रौशनी की एक सूक्ष्म सी किरण को 

हर ओर फैले स्याह अन्धकार को मिटाते हुए 

मैंने  देखा है 


हाँ मैंने देखा है 

सदियों से बंदिशों की क़ैद से छूटे हुए उस पंछी को 

विशाल अनंत आकाश में पंख फैलाये उड़ते हुए 

मैंने देखा है 


हाँ मैंने देखा है 

उपवन में खिलखिलाते रंग बिरंगे पुष्पों को 

बंजर ज़मीन का सीना चीर कर अस्तित्व में आते हुए 

मैंने देखा है 


हाँ मैंने देखा है 

सुकून और स्नेह की सुन्दर मशाल से फैले उजाले को 

संताप, दुःख और वेदना की कालिमा को मिटाते हुए 

मैंने देखा है 


हाँ मैंने देखा है 

स्वयं के साथ हुए हर उस अपमान और तिरस्कार को 

परमात्मा के नेक-दिली से आशीर्वाद में बदलते हुए 

मैंने देखा है 


हाँ मैंने देखा है 

पहाड़ों से शोरगुल करती कौतुहल करती सरिता को 

अनगिनत पाषाणशिलाओं में विशाल कटाव करते हुए 

मैंने देखा है 


हाँ मैंने देखा है 

मेरे बच्चे के चेहरे पर नाचती हुई उस अनमोल ख़ुशी को 

मुझे आगे बढ़ता, बनता, संवारता और तरक़्क़ी कर देखते हुए 

मैंने देखा है 


हाँ मैंने देखा है 

मेरे हमसफ़र की नज़रों में नितप्रति मेरे लिए बढ़ते सम्मान को 

मुझे अपना सपना अपनी शर्तों पर जीता देखते हुए 

मैंने देखा है 


हाँ मैंने देखा है 

मेरे कोमल हृदयी, अविकारी, निर्वैर  मुर्शिद की रहमतों को 

जन मानस का मुकद्दर संवारते हुए उनका कल्याण करते हुए 

मैंने देखा है 



डॉ त्रिपत मेहता 


Friday, September 15, 2023

क्या मैं आज़ाद हूँ

व्यथित हूँ , व्याकुल हूँ मैं 
कहीं गहरे अंतस में सुलग़ रहे 
बवंडर में लुप्त हूँ मैं 

जाने कैसी जवाबदेही के बेड़ियों में 
कैदियों की तरह जकड़ी हुई हूँ मैं 

जाने कैसा अविज्ञात बोझ अपने सीने पर 
हाँकती हुई, बस मूक बैठी हूँ मैं 

जाने क्यों अपनी अनगिनत अपेक्षाओं का नितप्रति 
प्रमुदित हो, कण्ठ घोंट रही हूँ मैं 

नजाने कब तक ऐसा ही चलेगा ये सिलसिला 

अपने अन्तर्मन में उठ रही इच्छाओं , अभिलाषाओं , प्रेरणाओं  को 
जाने कब तक पंख न दे पाऊँगी मैं 
जाने कब तक खुल के ना  जी पाऊँगी मैं 
जाने कब तक न उड़ पाऊँगी  मैं 

या फिर कहीं  ऐसा तो नहीं 

ये बेड़ियाँ , या बंदिशें, ये  क़ैद  
मैंने स्वयं  ही चुनी हों , खुद के लिए 
शायद मैंने ही "मैं " को "मैं " से जकड़ रखा हो  

और यदि ये सच है तो 

इस बेनाम, बेमतलब, बन्धन से, इस भार से 
मुझे स्वयं को मुक्त करना होगा 
मुझे स्वयं ही अपने पंखों से उड़ना सीखना होगा 
मुझे स्वयं ही "मैं" को "मैं" की जकड़न से आज़ाद करना होगा 
मुझे स्वयं ही, अपनी ही बनाए कारागृह  को 
अग्नि के सुपुर्द करना होगा 

खुद से वचबद्ध होना होगा 
की अब न कोई बंधन, न बाधा , न बेड़िया मेरे लिए  हैं 
अब यदि कुछ है तो 
नीले गगन में उड़ती हुई आज़ाद सिर्फ "मैं" 
मेरा अस्तित्व  और  मेरा स्वाभिमान है 



- डॉ त्रिपत मेहता 

Tuesday, September 12, 2023

विरासत

ना कुछ मेरा है, ना कुछ तेरा है

बस जो है, वो यहीं से लिया है

और यहीं पर देना है

तो फिर किस बात का अभिमान है, झूठी शान है और नकली इंसान है

भौतिक सुखों की अभिलाषा से क्या होगा

होना तो वही है जो माथे पे लिखा होगा

तू कर्म भूमि के पथ पर

कर्म करता चल निरन्तर

तू ठहर मत, तू रुक मत, तू झुक मत, तू थक मत, तू डर मत, तू सोच मत

तू अपने मार्ग पर उद्दंड चलता चल

कल क्या होगा, ये तू कल पर छोड़ दे

तू तो बस आज का गीत गुनगुनाता चल

और यदि कुछ संचय करना ही है 

तो ऐसी जागीर का कर

जो अनमोल है, अविकारी है, अमर है

जो मर कर भी साथ जानी है

और जो सदा सर्वदा साथ रहनी है

वो वही है

जो  पार्वती का शिव है

जो मीरा का कृष्ण है

जो लक्ष्मी का गणेश है

जो सीता का राम है

और जो राधा का श्याम है

वही तो हमारा भी असली धाम है

तो क्यों न आज से अभी से 

कुछ ऐसा कायदा कायम करें

की अबकी बार जो जाएं

तो फिर बहुरी वापिस ना आएं 


डॉ त्रिपत मेहता

Tuesday, August 22, 2023

फ़िल्हाल जी ले

ना ना  तुम मत रोको 
खुद को उड़ने से
ज़ंजीरो को तोड़ने से 
उड़ने दो खुद को, फ़ैला दो अपने पाँखो को 
ये मत सोचो की दुनिया क्या कहेगी 
दुनिया को अपना काम करने दो 
तुम अपना काम करो 
मत डालो भार अपने पंखों पर 
जी भर के उड़ान भरने दो इन्हें 
छू लेने दो इन्हें 
अपने हिस्से के आसमान को 
तुम तो बस उड़ो 
जितना चाहे उतना ऊँचा उड़ो 
खुल के जी लो
बटोर लो सारी खुशियाँ  
और बाँट दो अपने आस - पास 
हाँ तुम हो, तुम ही तो  हो जो 
जो अपनी कहानी खुद लिखोगे 
अपनी ज़िन्दगी के पन्नों को कोरा मत छोड़ो 
अपने मन के धरातल पर 
उभर रहे चित्र को 
तुम ही सजाओगे 
अपनी किस्मत के किरमिच पर 



डॉ त्रिपत मेहता 

Saturday, May 13, 2017

सिसकते रिश्ते

काश की ऐसा हो पाता
कि शाखों से टूटे पत्ते
फिर से उन्ही टहनियों पर
लहरा पाते
काश की ऐसा होता
कि  टूटे हुए तारे
फिर से विशाल आकाश में
जगमगा पाते
काश की ऐसा होता
कि रिश्तों के टूटे हुए तार
फिर से अपने सांचे में ढल पाते
खिलखिला पाते
काश....
मगर ये हो न पाएगा
वक़्त का पहिया तो चलता ही
चला जाएगा
और अच्छा है की न  हो पाएगा
गुजरते समय के साथ
अहसास भी गुजर गए
ज़िन्दगी के रंगमंच पर
आज एक नया किरदार उभर कर आया है
जो बेफिक्र है , जो ताज़ा है
जो हिम्मती है, जो निडर है
जो ताक़तवर है, जो दमदार है
जो अति सुन्दर है , जो तृप्त है... 

Tuesday, January 26, 2016

दासी



तेरे चरणों की दासी हूँ
करो कृपा हे प्रभू
तेरे दरस की प्यासी हूँ

"मैं" ना रहा अब कुछ नहीं शेष
तेरी कृपा से प्रभू
दासी ने पाया गुरु नरेश

राम नाम ही अौषध है
तेरा सुमीरन हे प्रभू
अात्मा का पोषण है

वाटिका का तू सुन्दर फूल
तेरा हर अादेश प्रभू
सर आँख पर है क़ुबूल

नाम ख़ुमारी चढ़े दिन रैन
प्रभू तेरे दर्शन को
तरसे मेरे दोनों नैन

राम रस से सदा रहूँ लिप्त
कृपािनधान प्रभू
यही चाहे दासी तृप्त 

Thursday, November 19, 2015

पिया मिलन का चाव



मोको पिया मिलन का चाव 
मैं बलिहारी राम की 
मैं बलिहारी राम की
मेरा दरद न जाने कोऊ  
मोको पिया मिलन चाव 
मेरा सतगुरु प्यारा 
मेरा सतगुरु न्यारा 

पीहू पीहू बोल्या पपीहा 
पीहू पीहू बोल्या पपीहा 
नईया पार लगाओ 
मोको पिया मिलन चाव 
मेरा सतगुरु प्यारा 
मेरा सतगुरु न्यारा 

कामिनी खसम को चाहे 
कामिनी खसम को चाहे 
बूँद बूँद अमृत बरसाओ 
मोको पिया मिलन चाव 
मेरा सतगुरु प्यारा 
मेरा सतगुरु न्यारा 

तन मन धन तुझको बेचेया 
तन मन धन तुझको बेचेया 
मन अब त्रिपत भया 
मोको पिया मिलन चाव 
मेरा सतगुरु प्यारा 
मेरा सतगुरु न्यारा 

Wednesday, March 6, 2013

अरमाँ

खुश हुआ है बहुत अंतर्मन
पर कहीं गहरे अंतस में
तीव्र उदासी भी है
नाच उठा है तन बदन
पर कही ख्वाबों की गली में
अखंड ठेहराव भी है
आशाओं से भर गया है मन
पर कहीं किसी धमनी में
अजीब सा खालीपन भी है
भानू की रोशनी से भरपूर है गगन
पर कहीं किसी कोने में
स्याह अँधेरा भी है
वर्षा की बूंदों से धरा है मगन
पर कही किसी कूचे में
बंजर सूखापन भी है
खुशियों ने थाम लिया है दामन
पर कहीं किसी रिश्ते में
नासूर गम के बादल भी हैं
शायद  इसी का नाम ज़िन्दगी है
हा इसी का नाम ज़िन्दगी है


Saturday, October 2, 2010

अनुभूति

आज अचानक
कहीं गहरे अंतस में
उसी मंदिर  कि घंटियाँ फिर से बजने लगी हैं
और आरती सुनाई देने लगी है 

जब मैं और मेरी सहेलियाँ
छुट्टी वाले दिन
बड़े ही चाव से बन-ठन के
मंदिर जाया करती थी
हर शाम घंटी बजने का 
इंतज़ार किया करतीं थीं

सच...
आज़ाद परिंदा था मन उन दिनों
जिसकी उड़ान की
कोई सीमा नहीं थी,
कोई निश्चित दिशा नहीं थी

बिल्कुल आज़ाद, बंदिशों रहित,
निर्मल, स्वच्छ आकाश में
उड़ान भरने को सदा तत्पर...
खुले-आम जी भर के जीने वाला
चित...
जिसका कही कोई मुकाबला ही नही था...

लेकिन आज अगर ढूंढने भी निकलूँ,
तो भी नहीं मिलता वो मंदिर
कान मानो तरस रहें हों आरती की आवाज़ को...

सहेलियों के भी धरौंदे टूटते समय न लगा
और कच से टूट कर बिखर गए

अब कोई राहगीर नहीं रहा राह में
और मन....
मन जैसे प्रत्येक क्षण
करहा रहा हो...छटपटा रहा हो...
एक बार फिर से उसी गगन को
चूमने को तरस रहा हो...

मगर अफ़सोस
उडारी भर न सकेगा
इन बंदिशों, बेड़ियों, समाज की खोखली जंजीरों में
बंध कर जो रह गया है

न जी सकेगा, न मर सकेगा
बस यूँ ही
घुट-घुट कर आहें भर कर रह जाएगा...

और इंतज़ार करेगा
एक नई प्रभात का
वाटिका में नई कोपलों के फूटने का
एक सुन्दर नवीन संसार का...

Monday, August 30, 2010

ग़ज़ल

तेरे हुस्न के तसव्वुर से रोशने-हयात हो गई 
तेरी बख्शीश हुई, तो ये कायनात बहशत हो गई
(तसव्वुर - ध्यान, हयात - ज़िन्दगी, बख्शीश - रहमत,
कायनात - सृष्टि, बहशत - स्वर्ग )

चिरागे-ज़ीस्त को  तूने दिया है इक सूरज नया,
तेरे ज़िक्र की कलंदरी में मेरी ज़ात फ़ना हो गई
(चिरागे-ज़ीस्त - जीवन रुपी दीया, कलंदरी - मस्ती,
ज़ात - अस्तित्व )

हो बैअत-ऐ-मुर्शिद चली मैं रूहानी राह पर,
वसूल कर तेरे दीदारे-हक़ को मैं तारक हो गई
(बैअत-ऐ-मुर्शिद - गुरु से दीक्षित, दीदारे-हक़ - दर्शन का अधिकार,
तारक - त्यागी )

नफ्स को रौंद दिया आरिफ की पुर-लुत्फी ने,
मकामे-हक़ की बंदगी ही बस, मेरी ज़िद्द हो गई
(नफ्स - मन, आरिफ - अल्लाह का नाम लेने वाला,
पुर-लुत्फी - आनंददायक, मकामे-हक़ - सतलोक )

है तेरी फेज़ से मेरी सबा हसीं,
रज़ा में तेरी सजदा कर, मैं आलिफ हो गई
(फेज़ - कृपा, सबा - प्रभात, रज़ा - मौज,
सजदा - परमात्मा के आगे सर झुकाना, आलिफ - अल्लाह की एकता )

खत्म हो गया समां हुकूमते-आगही का,
अल्ला-ताल्लाह से विसाल हुआ तो मैं "तृप्त" हो गई
(हुकूमते-आगही - बुद्धि का शासन, अल्ला-ताल्लाह - परमात्मा,
विसाल - मिलन, तृप्त - संतुष्ट )

Tuesday, July 27, 2010

दिले-बयाँ

नैन चक्षुओं को खुलना सिखा मौला,
ज़र्रे-ज़र्रे में तेरे अक्स को देखना सिखा मौला

कर्णों से सुनना सिखा मौला,
कौने -कौने में तेरे नाम कि अपार चर्चा सुनना सिखा मौला

नथनों से सूंघना सिखा मौला,
सृष्टि के कण-कण में बसी तेरी मदमस्त सुगंधी में डूबना सिखा मौला

कंठ को तेरी उस्तत करना सिखा मौला,
हर लफ़्ज में तेरा ज़िक्र हो ऐसा कोई नायाब गीत सिखा मौला

हस्त से लिखना सिखा मौला,
कविता के प्रत्येक शब्द में तेरे नाम का गुण-गान करना सिखा मौला

उदर कि क्षुदा को तड़पना सिखा मौला,
तेरे ध्यान कि ऊर्जा से भूखे पेट को भरना सिखा मौला

क़दमों को चलना सिखा मौला,
सकल द्वार को छोड़ कर तेरे नूरे-द्वार पर रुकना सिखा मौला

कामिनी को ख़सम होना सिखा मौला,
जन्म-मरण के चक्रव्यूह से अब तो विश्राम करना सिखा मौला

Saturday, June 26, 2010

ग़ज़ल

चले आए हैं तेरे दर पे कि
आज जाने कि जल्दी नहीं

किसी कि नजरों का इंतज़ार बनें कि
आज हमारे घर कोई नहीं

हैं भटक राहों में दर बदर रहें कि
आज मयखाने में प्यास बुझती नहीं

हो गया है याराना अन्धकार से कि
आज दिल-ऐ-चिराग ले रोशनी होती नहीं

अलफ़ाज़ बेकरार हैं होने को नज़म तरस के कि
आज सुरों कि बरसात होती नहीं

झुलस उठा है अंतर्मन ऐ "तृप्त" कि
आज बरखा भी दामन भिगोती नहीं


Monday, May 24, 2010

क्या कहूँ

तुम्हें किस नाम से पुकारूं
तुम्हारी किस किस अदा का क्या क्या नाम रखूँ

तुम्हें खुशनुमा हवा का केवल एक झोंका कहूँ
या अन्दर तक झंझोड़ देने वाली तीव्र आंधी...

तुम्हें मेरी आत्मा को "तृप्त" करने वाला शीतल नीर कहूँ
या मेरी देह को अमृत बनाने वाला क्षीर सागर...

तुम्हारे जीवन में मेरे अस्तित्व को
अपनी खुशनसीबी समझूँ
या तुम्हारी उदारता का एक सूक्ष्म उद्हारण...

तुम्हें चारों तरफ निस्वार्थ प्रेम की
रंगीन कलियों की महक बिखेरने वाली पवन कहूँ
या खुशबूदार खिलखिलाते फूलों से सजा बागीचा...

निर्णय नहीं ले पा रहीं हूँ
कि...

तुम्हें चिलचिलाती गर्मी में
धरा को हरा भरा बनाने वाली वर्षा की पहली बूँद कहूँ
या सावन के नीर बरसाते घनघोर बादल...

तुम्हें काले अँधेरे के सीने को चीरती हुई रोशनी की किरण कहूँ
या पूनम की रात्री का मदहोश कर देने वाले चाँद की चाँदनी...

तुम्हें शंख में छिपा मोती कहूँ
या कुबेर की खज़ाना...

समझ नहीं पा रही हूँ
कि...

तुम्हें ब्रह्म कि ऊर्जा बिखेरने वाला रथ कहूँ
या स्वयं ब्रह्म...

Friday, March 5, 2010

तब्बसुम-ऐ-यार

यादों कि डालियों पे
ख़्वाबों ने
जज्बादों के धरौंदों पर
अनगिनत लम्हों का
सुंदर आशिआना बना रखा है
दिल के आँगन में
अरमानो के मनमोहक
खिलखिलाते फूलों से सजी
हसरतों कि डोली में बैठी
उम्मीदों कि नई  नवेली दुल्हन
दामन में अनेक आरजुओ को समेटे
सपनो के समंदर में
अनमोल पलों को संजोए
लहरों के साथ
डूबती चली जा रही है
नयनो के सावन से बरसती
रिमझिम बौछार में
चित, मौर सा अठखेलियाँ करता
नजाने किस किस देश में
किस किस डगर पर
मस्ती में पंख बिखेरे
आशाओं कि पगडंडियों पर
नृत्य कर
बड़ी ही शिद्दत से
अरमानों का झूला
झूल रहा है
यादों कि डालियों पे
ख़्वाबों ने...

Saturday, January 2, 2010

सोहना सजन

सर्दियों की मखमली धूप से भी ज्यादा
कोमल है तेरी यादों का स्पर्श
तेरे साथ बीता मेरा हर पल, मादक है
कहतें है मदहोशी की बातें
ज़हन में नहीं रहतीं
मगर तेरे साथ का ये कैसा नशा है
कि
इक इक पल याद बन कर दौड़ रहा है
मेरी देह में लहू के साथ
बहुत बार छलकी ये आँखें
बहुत बार गीली हुई ये पलकें
मगर इतना दम किसी जज्बाद में नहीं था
की ले बहें खुद के साथ
मेरे सोहने यार के सुन्दर एहसास को
एक अजब नशा है, एक गज़ब मजा है
मेरी आँखों में बसी तेरी तस्वीर में
तेरा हर अंदाज़ निराला है
तेरा हर कदम मतवाला है
जब होती हूँ रु-ब-रु तुझसे मेरे ख़्वाबों में
कही न होते हुए भी
तू हर पल मेरे संग है
मेरे ख्यालों के कारवां में बस तू है
जहान में न था, न होगा
मेरे सनम सा सुन्दर कोई
जिसकी आँखों में तेज
चेहरे पर मुस्कान है
बस यही तो मेरे सोहने यार की पहचान है

नजाने क्यों

 नजाने क्यों, सब को सब कुछ पाने की होड़ लगी है नजाने क्यों, सब को सबसे आगे निकलने की होड़ लगी है जो मिल गया है, उसको अनदेखा कर दिया है और जो...