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दृष्टिकोण

बड़े सुहाने दिन थे वो जब ज़िन्दगी
सिर्फ़ मेरे लिए, किसी हसीन अफ़साने से कम न थी
जब उगते हुए सूरज की हर किरण
सिर्फ़ मेरे लिए, अपने साथ हजारों रंग लिए आती थी
जब पड़ोस में मुर्गा सुबह सुबह
सिर्फ़ मेरे लिए, जोर से बांग देता था
जब बागीचे का फूल फूल
सिर्फ़ मेरे लिए, खुशबू बिखेरा करता था
जब गर्मी की तेज धुप को चीरते हुए बादल
सिर्फ़ मेरे लिए, जी भर कर बरसते थे
जब खुले निर्मल आकाश में इन्द्रधनुष
सिर्फ़ मेरे लिए, रंगों की बौछार करता था
जब गली में खेलते हुए बच्चों में से मेरी माँ
सिर्फ़ मेरे ही चेहरे पर, खुशी को नाचते हुए देखा करती थी
सच...ये कायनात अज़ब सुंदर थी
जब मैं बच्ची थी...

Comments

amarjeet kaunke said…
aapki yah kavita apne bachpan ko talaashti hui kavita hai..jab ham vartmaan se santusht nahi hote to ateet me lautna hame romanchit karta hai....bahut hi khubsurti se bhavon ko shabdon me sanjoya hai...mubarak
raj said…
bahut khoobsurat hote hai wo din jab har cheez apko apni lagti hai....khoobsurat kavita...
Harkirat Haqeer said…
वाह.......अपने बचपन को क्या सुंदर अभिव्यक्ति से बाँधा है आपने .....

बहुत खूब .....!!
Harkirat Haqeer said…
वाह.......अपने बचपन को क्या सुंदर अभिव्यक्ति से बाँधा है आपने .....!!

बहुत खूब .....!!
vandana said…
waah waah........ek bachchi me manobhavon ko bakhubi ukera hai.........badhayi
u r not a professional writer? but u writr so well!thanx for ur comment.
vikram7 said…
जब गली में खेलते हुए बच्चों में से मेरी माँ
सिर्फ़ मेरे ही चेहरे पर, खुशी को नाचते हुए देखा करती थी
बचपन की यादो की सुन्दर अभिव्यक्ति
Jogi said…
waah re bachpan :) !!
Anonymous said…
I think this is one of the most important information for me. And i am glad reading your article. But should remark on few general things, The website style is perfect, the articles is really nice

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अनुभूति

आज अचानक
कहीं गहरे अंतस में
उसी मंदिर  कि घंटियाँ फिर से बजने लगी हैं
और आरती सुनाई देने लगी है 

जब मैं और मेरी सहेलियाँ
छुट्टी वाले दिन
बड़े ही चाव से बन-ठन के
मंदिर जाया करती थी
हर शाम घंटी बजने का 
इंतज़ार किया करतीं थीं

सच...
आज़ाद परिंदा था मन उन दिनों
जिसकी उड़ान की
कोई सीमा नहीं थी,
कोई निश्चित दिशा नहीं थी

बिल्कुल आज़ाद, बंदिशों रहित,
निर्मल, स्वच्छ आकाश में
उड़ान भरने को सदा तत्पर...
खुले-आम जी भर के जीने वाला
चित...
जिसका कही कोई मुकाबला ही नही था...

लेकिन आज अगर ढूंढने भी निकलूँ,
तो भी नहीं मिलता वो मंदिर
कान मानो तरस रहें हों आरती की आवाज़ को...

सहेलियों के भी धरौंदे टूटते समय न लगा
और कच से टूट कर बिखर गए

अब कोई राहगीर नहीं रहा राह में
और मन....
मन जैसे प्रत्येक क्षण
करहा रहा हो...छटपटा रहा हो...
एक बार फिर से उसी गगन को
चूमने को तरस रहा हो...

मगर अफ़सोस
उडारी भर न सकेगा
इन बंदिशों, बेड़ियों, समाज की खोखली जंजीरों में
बंध कर जो रह गया है

न जी सकेगा, न मर सकेगा
बस यूँ ही
घुट-घुट कर आहें भर कर रह जाएगा...

और इंतज़ार करेगा
एक नई प्रभात का
वाटिका में नई कोपलों के फूटने का
एक सुन्द…

दासी

तेरे चरणों की दासी हूँ
करो कृपा हे प्रभू
तेरे दरस की प्यासी हूँ

"मैं" ना रहा अब कुछ नहीं शेष
तेरी कृपा से प्रभू
दासी ने पाया गुरु नरेश

राम नाम ही अौषध है
तेरा सुमीरन हे प्रभू
अात्मा का पोषण है

वाटिका का तू सुन्दर फूल
तेरा हर अादेश प्रभू
सर आँख पर है क़ुबूल

नाम ख़ुमारी चढ़े दिन रैन
प्रभू तेरे दर्शन को
तरसे मेरे दोनों नैन

राम रस से सदा रहूँ लिप्त
कृपािनधान प्रभू
यही चाहे दासी तृप्त

सिसकते रिश्ते

काश की ऐसा हो पाता
कि शाखों से टूटे पत्ते
फिर से उन्ही टहनियों पर
लहरा पाते
काश की ऐसा होता
कि  टूटे हुए तारे
फिर से विशाल आकाश में
जगमगा पाते
काश की ऐसा होता
कि रिश्तों के टूटे हुए तार
फिर से अपने सांचे में ढल पाते
खिलखिला पाते
काश....
मगर ये हो न पाएगा
वक़्त का पहिया तो चलता ही
चला जाएगा
और अच्छा है की न  हो पाएगा
गुजरते समय के साथ
अहसास भी गुजर गए
ज़िन्दगी के रंगमंच पर
आज एक नया किरदार उभर कर आया है
जो बेफिक्र है , जो ताज़ा है
जो हिम्मती है, जो निडर है
जो ताक़तवर है, जो दमदार है
जो अति सुन्दर है , जो तृप्त है...