Thursday, August 27, 2009

दृष्टिकोण

बड़े सुहाने दिन थे वो जब ज़िन्दगी
सिर्फ़ मेरे लिए, किसी हसीन अफ़साने से कम न थी
जब उगते हुए सूरज की हर किरण
सिर्फ़ मेरे लिए, अपने साथ हजारों रंग लिए आती थी
जब पड़ोस में मुर्गा सुबह सुबह
सिर्फ़ मेरे लिए, जोर से बांग देता था
जब बागीचे का फूल फूल
सिर्फ़ मेरे लिए, खुशबू बिखेरा करता था
जब गर्मी की तेज धुप को चीरते हुए बादल
सिर्फ़ मेरे लिए, जी भर कर बरसते थे
जब खुले निर्मल आकाश में इन्द्रधनुष
सिर्फ़ मेरे लिए, रंगों की बौछार करता था
जब गली में खेलते हुए बच्चों में से मेरी माँ
सिर्फ़ मेरे ही चेहरे पर, खुशी को नाचते हुए देखा करती थी
सच...ये कायनात अज़ब सुंदर थी
जब मैं बच्ची थी...

11 comments:

amarjeet kaunke said...

aapki yah kavita apne bachpan ko talaashti hui kavita hai..jab ham vartmaan se santusht nahi hote to ateet me lautna hame romanchit karta hai....bahut hi khubsurti se bhavon ko shabdon me sanjoya hai...mubarak

raj said...

bahut khoobsurat hote hai wo din jab har cheez apko apni lagti hai....khoobsurat kavita...

Harkirat Haqeer said...

वाह.......अपने बचपन को क्या सुंदर अभिव्यक्ति से बाँधा है आपने .....

बहुत खूब .....!!

Harkirat Haqeer said...

वाह.......अपने बचपन को क्या सुंदर अभिव्यक्ति से बाँधा है आपने .....!!

बहुत खूब .....!!

vandana said...

waah waah........ek bachchi me manobhavon ko bakhubi ukera hai.........badhayi

Suman said...

nice

विनय ‘नज़र’ said...

बहुत सुन्दर
---
तख़लीक़-ए-नज़र

लता 'हया' said...

u r not a professional writer? but u writr so well!thanx for ur comment.

vikram7 said...

जब गली में खेलते हुए बच्चों में से मेरी माँ
सिर्फ़ मेरे ही चेहरे पर, खुशी को नाचते हुए देखा करती थी
बचपन की यादो की सुन्दर अभिव्यक्ति

Jogi said...

waah re bachpan :) !!

Anonymous said...

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