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Showing posts from May, 2009

द्वन्द

अपने ही विचारों की दल दल में
कहीं गुम सी होती चली जा रही हूँ मैं
डर है कहीं ख़ुद के ही अस्तित्व को
न खो बैठूं मैं
पता नहीं ये डगर किस ओर ले जा रही है
या ख़ुद इसी राह से लिपटी चली जा रही हूँ मैं
है मंजिल कहाँ , कहाँ ठिकाना है, कुछ ख़बर नही
बस
सूखे पत्ते की तरह हवा में बहती चली जा रही हूँ मैं
मलिन हो गया है अंतर्मन या नही सुनाई देती आत्मा की आवाज़
आज उज्जवल दृश्य नही देख पा रही हूँ मैं
मन के पर्दे पर अठखेलियाँ करते भिन्न भिन्न रंगों में से
सफ़ेद रंग को पा लेने की आरजू करती चली जा रही हूँ मैं
येकैसीदुविधाहै, कैसाफ़सानाहै
कीलोगकहतेंहै
आंखोंसेहीसबबयानकरेजारहीहूँमैं