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ग़ज़ल

तेरे हुस्न के तसव्वुर से रोशने-हयात हो गई 
तेरी बख्शीश हुई, तो ये कायनात बहशत हो गई
(तसव्वुर - ध्यान, हयात - ज़िन्दगी, बख्शीश - रहमत,
कायनात - सृष्टि, बहशत - स्वर्ग )

चिरागे-ज़ीस्त को  तूने दिया है इक सूरज नया,
तेरे ज़िक्र की कलंदरी में मेरी ज़ात फ़ना हो गई
(चिरागे-ज़ीस्त - जीवन रुपी दीया, कलंदरी - मस्ती,
ज़ात - अस्तित्व )

हो बैअत-ऐ-मुर्शिद चली मैं रूहानी राह पर,
वसूल कर तेरे दीदारे-हक़ को मैं तारक हो गई
(बैअत-ऐ-मुर्शिद - गुरु से दीक्षित, दीदारे-हक़ - दर्शन का अधिकार,
तारक - त्यागी )

नफ्स को रौंद दिया आरिफ की पुर-लुत्फी ने,
मकामे-हक़ की बंदगी ही बस, मेरी ज़िद्द हो गई
(नफ्स - मन, आरिफ - अल्लाह का नाम लेने वाला,
पुर-लुत्फी - आनंददायक, मकामे-हक़ - सतलोक )

है तेरी फेज़ से मेरी सबा हसीं,
रज़ा में तेरी सजदा कर, मैं आलिफ हो गई
(फेज़ - कृपा, सबा - प्रभात, रज़ा - मौज,
सजदा - परमात्मा के आगे सर झुकाना, आलिफ - अल्लाह की एकता )

खत्म हो गया समां हुकूमते-आगही का,
अल्ला-ताल्लाह से विसाल हुआ तो मैं "तृप्त" हो गई
(हुकूमते-आगही - बुद्धि का शासन, अल्ला-ताल्लाह - परमात्मा,
विसाल - मिलन, तृप्त - संतुष्ट )

Comments

चिरागे-ज़ीस्त को तूने दिया है इक सूरज नया,
तेरे ज़िक्र की कलंदरी में मेरी ज़ात फ़ना हो गई.

खूबसूरत !!
nil said…
As always... beautiful! Your poems really make me think and reflect.... I really hope you keep writing!
and where have u been?! haven't seen u on my page for a while!!

hope you're good :)
Anonymous said…
Excellent.
बहुत खूबसूरत गज़ल ....शब्दों के अर्थ दिए हुए थे नहीं तो समझना ही मुश्किल हो जाता ...शुक्रिया
Mr Happy said…
wallah, aapki gajal padke to mein bhi fanaa ho gaya :)
Ankit said…
bahut hi umda !!!

har lafz ko mehsus kiya ja sakta hai !!!

jo likha hai bas koi shabd nahin hain inki taarif karne ke liye !!

Happy Blogging and take care !!!
Majaal said…
शायरी-ए-ख़ालिस, लफ्ज़-ए-वज़नदार समझाने में,
मियां मजाल की क्या हालत हो गयी !

ऐसे भारी भरकम लफ्ज़ तो पहले कहीं नहीं सुने. 'तृप्त' तो शुद्ध हिंदी होता है मेरे ख़याल से.
Rahul said…
Nice...ur word power is strong ...
Bikramjit said…
very nicely written , loved this one toooo and thanks for putting the meanings of the words alongwith helped understand better GOOOD
Arpit Rastogi said…
By god.. Kya likhte ho yar aap.. :)
mere paas urdu me to koi shabd nahi hai tareef karne ke liye to english me hi likh deta hun..
Awesome. :)
Mansoor Naqvi said…
Pehli bar aapka kalaam padha....
sirf ek hi lafz dimaag me aaya...
LAAJAWAB..
Babli said…
आपको एवं आपके परिवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें !
बहुत बढ़िया ! उम्दा प्रस्तुती!
Tripat "Prerna" said…
bahut bahut shukriya...aap sabhi ka...
@ majaal - yes tript is a hindi word
PKSingh said…
बहुत खूबसूरत गज़ल ....
thanks for nice comment isi bahane yahan tak aana hua achcha laga
Indrani said…
You write very well.
It is a beautiful poem.
बहुत खूब!
आशीष
words are really beautiful and you have got an amazing vocab....

but calling this composition a "ghazal", well....its anything but a ghazal.

i hope you wont take it otherwise...
भई ..वाह..क्या गज़ल है?
बहुत ही उम्दा ...बहुत ही बढ़िया .
पढ़कर मज़ा आ गया .
आपके ब्लॉग को आज चर्चामंच पर संकलित किया है.. एक बार देखिएगा जरूर..
http://charchamanch.blogspot.com/
uff aapke urdu lafzo ka jabab nahi....jaandaar:)
follow karna pada!!
uff aapke urdu lafzo ka jabab nahi....jaandaar:)
follow karna pada!!
uff aapke urdu lafzo ka jabab nahi....jaandaar:)
follow karna pada!!
मुस्किल मगर बहुत खूब
MUFLIS said…
arrangement of words
just amazing.....
defi.... excellent vocab..
and yes...
Gautam must have been
under the influence of the composition of this very gamut.
viddhi said…
amazingly good ..!
Bikramjit said…
hey where r u not writtne anything for long ...

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अनुभूति

आज अचानक
कहीं गहरे अंतस में
उसी मंदिर  कि घंटियाँ फिर से बजने लगी हैं
और आरती सुनाई देने लगी है 

जब मैं और मेरी सहेलियाँ
छुट्टी वाले दिन
बड़े ही चाव से बन-ठन के
मंदिर जाया करती थी
हर शाम घंटी बजने का 
इंतज़ार किया करतीं थीं

सच...
आज़ाद परिंदा था मन उन दिनों
जिसकी उड़ान की
कोई सीमा नहीं थी,
कोई निश्चित दिशा नहीं थी

बिल्कुल आज़ाद, बंदिशों रहित,
निर्मल, स्वच्छ आकाश में
उड़ान भरने को सदा तत्पर...
खुले-आम जी भर के जीने वाला
चित...
जिसका कही कोई मुकाबला ही नही था...

लेकिन आज अगर ढूंढने भी निकलूँ,
तो भी नहीं मिलता वो मंदिर
कान मानो तरस रहें हों आरती की आवाज़ को...

सहेलियों के भी धरौंदे टूटते समय न लगा
और कच से टूट कर बिखर गए

अब कोई राहगीर नहीं रहा राह में
और मन....
मन जैसे प्रत्येक क्षण
करहा रहा हो...छटपटा रहा हो...
एक बार फिर से उसी गगन को
चूमने को तरस रहा हो...

मगर अफ़सोस
उडारी भर न सकेगा
इन बंदिशों, बेड़ियों, समाज की खोखली जंजीरों में
बंध कर जो रह गया है

न जी सकेगा, न मर सकेगा
बस यूँ ही
घुट-घुट कर आहें भर कर रह जाएगा...

और इंतज़ार करेगा
एक नई प्रभात का
वाटिका में नई कोपलों के फूटने का
एक सुन्द…

दासी

तेरे चरणों की दासी हूँ
करो कृपा हे प्रभू
तेरे दरस की प्यासी हूँ

"मैं" ना रहा अब कुछ नहीं शेष
तेरी कृपा से प्रभू
दासी ने पाया गुरु नरेश

राम नाम ही अौषध है
तेरा सुमीरन हे प्रभू
अात्मा का पोषण है

वाटिका का तू सुन्दर फूल
तेरा हर अादेश प्रभू
सर आँख पर है क़ुबूल

नाम ख़ुमारी चढ़े दिन रैन
प्रभू तेरे दर्शन को
तरसे मेरे दोनों नैन

राम रस से सदा रहूँ लिप्त
कृपािनधान प्रभू
यही चाहे दासी तृप्त

सिसकते रिश्ते

काश की ऐसा हो पाता
कि शाखों से टूटे पत्ते
फिर से उन्ही टहनियों पर
लहरा पाते
काश की ऐसा होता
कि  टूटे हुए तारे
फिर से विशाल आकाश में
जगमगा पाते
काश की ऐसा होता
कि रिश्तों के टूटे हुए तार
फिर से अपने सांचे में ढल पाते
खिलखिला पाते
काश....
मगर ये हो न पाएगा
वक़्त का पहिया तो चलता ही
चला जाएगा
और अच्छा है की न  हो पाएगा
गुजरते समय के साथ
अहसास भी गुजर गए
ज़िन्दगी के रंगमंच पर
आज एक नया किरदार उभर कर आया है
जो बेफिक्र है , जो ताज़ा है
जो हिम्मती है, जो निडर है
जो ताक़तवर है, जो दमदार है
जो अति सुन्दर है , जो तृप्त है...