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Inner Voice


Clues given by the "Idols" are always meant for some reason, are always helpful and for the betterment. But we never consider them - may be because our EGO is more dominating than our Soul's voice.
Our Mind wants logic for every thing & if it is not fed at very moment then it suppresses our pure Soul's voice and finally we follow our Mind inspite of Soul.
But when we encounter with that particular situation, about which we were already aware by the Idol, that time we actually realise why it was said.
I think following our Idols "Blindly" , yes "blindly" prevent us from so many adverse situations in life and hence we can lead our life in a better way.
But the problem lies, if we will follow blindly then what about our EGO. Mind always tries to dominate on us and around in 90% of cases we follow our Mind inspite of our Soul and hence we keep on encountering the troublsome situations in life, but still we don't want to follow our Soul.
Why?
According to my personal experience if we want our life to br on smooth track, then we have to prepare ourself, so that, we have the ability to hear Supreme's voice and believe me, it is not at all a tough task. Infact it will change the meaning of life and take you near to him.
Following Soul's voice can surpass so many adverse situations, because "He" is really Great. He always gives us a chance to hear our inner voice and if we start hearing it , nothing can be compared with.

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अनुभूति

आज अचानक
कहीं गहरे अंतस में
उसी मंदिर  कि घंटियाँ फिर से बजने लगी हैं
और आरती सुनाई देने लगी है 

जब मैं और मेरी सहेलियाँ
छुट्टी वाले दिन
बड़े ही चाव से बन-ठन के
मंदिर जाया करती थी
हर शाम घंटी बजने का 
इंतज़ार किया करतीं थीं

सच...
आज़ाद परिंदा था मन उन दिनों
जिसकी उड़ान की
कोई सीमा नहीं थी,
कोई निश्चित दिशा नहीं थी

बिल्कुल आज़ाद, बंदिशों रहित,
निर्मल, स्वच्छ आकाश में
उड़ान भरने को सदा तत्पर...
खुले-आम जी भर के जीने वाला
चित...
जिसका कही कोई मुकाबला ही नही था...

लेकिन आज अगर ढूंढने भी निकलूँ,
तो भी नहीं मिलता वो मंदिर
कान मानो तरस रहें हों आरती की आवाज़ को...

सहेलियों के भी धरौंदे टूटते समय न लगा
और कच से टूट कर बिखर गए

अब कोई राहगीर नहीं रहा राह में
और मन....
मन जैसे प्रत्येक क्षण
करहा रहा हो...छटपटा रहा हो...
एक बार फिर से उसी गगन को
चूमने को तरस रहा हो...

मगर अफ़सोस
उडारी भर न सकेगा
इन बंदिशों, बेड़ियों, समाज की खोखली जंजीरों में
बंध कर जो रह गया है

न जी सकेगा, न मर सकेगा
बस यूँ ही
घुट-घुट कर आहें भर कर रह जाएगा...

और इंतज़ार करेगा
एक नई प्रभात का
वाटिका में नई कोपलों के फूटने का
एक सुन्द…

दासी

तेरे चरणों की दासी हूँ
करो कृपा हे प्रभू
तेरे दरस की प्यासी हूँ

"मैं" ना रहा अब कुछ नहीं शेष
तेरी कृपा से प्रभू
दासी ने पाया गुरु नरेश

राम नाम ही अौषध है
तेरा सुमीरन हे प्रभू
अात्मा का पोषण है

वाटिका का तू सुन्दर फूल
तेरा हर अादेश प्रभू
सर आँख पर है क़ुबूल

नाम ख़ुमारी चढ़े दिन रैन
प्रभू तेरे दर्शन को
तरसे मेरे दोनों नैन

राम रस से सदा रहूँ लिप्त
कृपािनधान प्रभू
यही चाहे दासी तृप्त

सिसकते रिश्ते

काश की ऐसा हो पाता
कि शाखों से टूटे पत्ते
फिर से उन्ही टहनियों पर
लहरा पाते
काश की ऐसा होता
कि  टूटे हुए तारे
फिर से विशाल आकाश में
जगमगा पाते
काश की ऐसा होता
कि रिश्तों के टूटे हुए तार
फिर से अपने सांचे में ढल पाते
खिलखिला पाते
काश....
मगर ये हो न पाएगा
वक़्त का पहिया तो चलता ही
चला जाएगा
और अच्छा है की न  हो पाएगा
गुजरते समय के साथ
अहसास भी गुजर गए
ज़िन्दगी के रंगमंच पर
आज एक नया किरदार उभर कर आया है
जो बेफिक्र है , जो ताज़ा है
जो हिम्मती है, जो निडर है
जो ताक़तवर है, जो दमदार है
जो अति सुन्दर है , जो तृप्त है...