Skip to main content

वक्त की भी अजीब कशमकश है....

वक्त की भी अजीब कशमकश है
की वो है तो हम नही और
जो आज हम है तो उनका निशाँ गुम है
वक्त की भी अजीब कशमकश है

जानता है दीवाना दिल की वो नही है इसकी मंजिल
फिर भी उसी रह पर चलने का शौकीन है
वक्त की भी अजीब कशमकश है

न कोई गिला न शिकवा है उनसे
की वो तो हाले - दिल से बेखबर है
वक्त की भी अजीब कशमकश है

वो सादगी में बिता गए हजारो लम्हे
हर पल में मानो ज़िन्दगी जी ली हो हमने
वक्त की भी अजीब कशमकश है

मूँद ली थी आँखें हमने तो उनके इंतज़ार में
पर दगाबाज़ सांसें बह रही है उनकी यादों के भंवर में
वक्त की भी अजीब कशमकश है

न हो सके हम उनके फिर भी है इक तस्सल्ली
की होगा मिलन रूह का रूह से अगले जहान में
वक्त की भी अजीब कशमकश है...

Comments

Shamikh Faraz said…
वक्त की भी अजीब कशमकश है
की वो है तो हम नही और
जो आज हम है तो उनका निशाँ गुम है
वक्त की भी अजीब कशमकश है

bahut khub prerna ji. badhai
Dr Gabby singh said…
bahut badia hai aur sach hai.....
मूल्यवान विचार एवं अभिव्यक्ति ..धन्यवाद ..
'Kush' ktheLeo said…
सुन्दर विचारों में,दर्द को पिरोया है आप ने.

Popular posts from this blog

अनुभूति

आज अचानक
कहीं गहरे अंतस में
उसी मंदिर  कि घंटियाँ फिर से बजने लगी हैं
और आरती सुनाई देने लगी है 

जब मैं और मेरी सहेलियाँ
छुट्टी वाले दिन
बड़े ही चाव से बन-ठन के
मंदिर जाया करती थी
हर शाम घंटी बजने का 
इंतज़ार किया करतीं थीं

सच...
आज़ाद परिंदा था मन उन दिनों
जिसकी उड़ान की
कोई सीमा नहीं थी,
कोई निश्चित दिशा नहीं थी

बिल्कुल आज़ाद, बंदिशों रहित,
निर्मल, स्वच्छ आकाश में
उड़ान भरने को सदा तत्पर...
खुले-आम जी भर के जीने वाला
चित...
जिसका कही कोई मुकाबला ही नही था...

लेकिन आज अगर ढूंढने भी निकलूँ,
तो भी नहीं मिलता वो मंदिर
कान मानो तरस रहें हों आरती की आवाज़ को...

सहेलियों के भी धरौंदे टूटते समय न लगा
और कच से टूट कर बिखर गए

अब कोई राहगीर नहीं रहा राह में
और मन....
मन जैसे प्रत्येक क्षण
करहा रहा हो...छटपटा रहा हो...
एक बार फिर से उसी गगन को
चूमने को तरस रहा हो...

मगर अफ़सोस
उडारी भर न सकेगा
इन बंदिशों, बेड़ियों, समाज की खोखली जंजीरों में
बंध कर जो रह गया है

न जी सकेगा, न मर सकेगा
बस यूँ ही
घुट-घुट कर आहें भर कर रह जाएगा...

और इंतज़ार करेगा
एक नई प्रभात का
वाटिका में नई कोपलों के फूटने का
एक सुन्द…

दासी

तेरे चरणों की दासी हूँ
करो कृपा हे प्रभू
तेरे दरस की प्यासी हूँ

"मैं" ना रहा अब कुछ नहीं शेष
तेरी कृपा से प्रभू
दासी ने पाया गुरु नरेश

राम नाम ही अौषध है
तेरा सुमीरन हे प्रभू
अात्मा का पोषण है

वाटिका का तू सुन्दर फूल
तेरा हर अादेश प्रभू
सर आँख पर है क़ुबूल

नाम ख़ुमारी चढ़े दिन रैन
प्रभू तेरे दर्शन को
तरसे मेरे दोनों नैन

राम रस से सदा रहूँ लिप्त
कृपािनधान प्रभू
यही चाहे दासी तृप्त

सिसकते रिश्ते

काश की ऐसा हो पाता
कि शाखों से टूटे पत्ते
फिर से उन्ही टहनियों पर
लहरा पाते
काश की ऐसा होता
कि  टूटे हुए तारे
फिर से विशाल आकाश में
जगमगा पाते
काश की ऐसा होता
कि रिश्तों के टूटे हुए तार
फिर से अपने सांचे में ढल पाते
खिलखिला पाते
काश....
मगर ये हो न पाएगा
वक़्त का पहिया तो चलता ही
चला जाएगा
और अच्छा है की न  हो पाएगा
गुजरते समय के साथ
अहसास भी गुजर गए
ज़िन्दगी के रंगमंच पर
आज एक नया किरदार उभर कर आया है
जो बेफिक्र है , जो ताज़ा है
जो हिम्मती है, जो निडर है
जो ताक़तवर है, जो दमदार है
जो अति सुन्दर है , जो तृप्त है...