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वक्त की भी अजीब कशमकश है....

वक्त की भी अजीब कशमकश है
की वो है तो हम नही और
जो आज हम है तो उनका निशाँ गुम है
वक्त की भी अजीब कशमकश है

जानता है दीवाना दिल की वो नही है इसकी मंजिल
फिर भी उसी रह पर चलने का शौकीन है
वक्त की भी अजीब कशमकश है

न कोई गिला न शिकवा है उनसे
की वो तो हाले - दिल से बेखबर है
वक्त की भी अजीब कशमकश है

वो सादगी में बिता गए हजारो लम्हे
हर पल में मानो ज़िन्दगी जी ली हो हमने
वक्त की भी अजीब कशमकश है

मूँद ली थी आँखें हमने तो उनके इंतज़ार में
पर दगाबाज़ सांसें बह रही है उनकी यादों के भंवर में
वक्त की भी अजीब कशमकश है

न हो सके हम उनके फिर भी है इक तस्सल्ली
की होगा मिलन रूह का रूह से अगले जहान में
वक्त की भी अजीब कशमकश है...

Comments

Shamikh Faraz said…
वक्त की भी अजीब कशमकश है
की वो है तो हम नही और
जो आज हम है तो उनका निशाँ गुम है
वक्त की भी अजीब कशमकश है

bahut khub prerna ji. badhai
Dr Gabby singh said…
bahut badia hai aur sach hai.....
मूल्यवान विचार एवं अभिव्यक्ति ..धन्यवाद ..
'Kush' ktheLeo said…
सुन्दर विचारों में,दर्द को पिरोया है आप ने.

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दासी

तेरे चरणों की दासी हूँ
करो कृपा हे प्रभू
तेरे दरस की प्यासी हूँ

"मैं" ना रहा अब कुछ नहीं शेष
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राम नाम ही अौषध है
तेरा सुमीरन हे प्रभू
अात्मा का पोषण है

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कृपािनधान प्रभू
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सिसकते रिश्ते

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फिर से उन्ही टहनियों पर
लहरा पाते
काश की ऐसा होता
कि  टूटे हुए तारे
फिर से विशाल आकाश में
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काश की ऐसा होता
कि रिश्तों के टूटे हुए तार
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काश....
मगर ये हो न पाएगा
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गुजरते समय के साथ
अहसास भी गुजर गए
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जो बेफिक्र है , जो ताज़ा है
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जो ताक़तवर है, जो दमदार है
जो अति सुन्दर है , जो तृप्त है...

अरमाँ

खुश हुआ है बहुत अंतर्मन
पर कहीं गहरे अंतस में
तीव्र उदासी भी है
नाच उठा है तन बदन
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अखंड ठेहराव भी है
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पर कहीं किसी धमनी में
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पर कहीं किसी कोने में
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वर्षा की बूंदों से धरा है मगन
पर कही किसी कूचे में
बंजर सूखापन भी है
खुशियों ने थाम लिया है दामन
पर कहीं किसी रिश्ते में
नासूर गम के बादल भी हैं
शायद  इसी का नाम ज़िन्दगी है
हा इसी का नाम ज़िन्दगी है