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द्वन्द

अपने ही विचारों की दल दल में
कहीं गुम सी होती चली जा रही हूँ मैं
डर है कहीं ख़ुद के ही अस्तित्व को
न खो बैठूं मैं
पता नहीं ये डगर किस ओर ले जा रही है
या ख़ुद इसी राह से लिपटी चली जा रही हूँ मैं
है मंजिल कहाँ , कहाँ ठिकाना है, कुछ ख़बर नही
बस
सूखे पत्ते की तरह हवा में बहती चली जा रही हूँ मैं
मलिन हो गया है अंतर्मन या नही सुनाई देती आत्मा की आवाज़
आज उज्जवल दृश्य नही देख पा रही हूँ मैं
मन के पर्दे पर अठखेलियाँ करते भिन्न भिन्न रंगों में से
सफ़ेद रंग को पा लेने की आरजू करती चली जा रही हूँ मैं
ये कैसी दुविधा है, कैसा फ़साना है
की लोग कहतें है
आंखों से ही सब बयान करे जा रही हूँ मैं

Comments

raj said…
hmm duwida to hai....yeh kare ya woh kare aisa kare ya waisa kare....chooti si zindgee me akhir kya kya kare....khubsurat racna....
vandana said…
waah waah .........shandar, nari man ke bhavon ko bakhoobi darshaya hai.
विनय said…
bahut baDhiya hai jee!
Harkirat Haqeer said…
सफ़ेद रंग पाक और साफ होता है फिर दुविधा कैसी ....?? दलदल में घुसेगीं तो कई और रंग लगते चले जायेगे .....पर आपने मन के भावों को जिस सत्यता से पिरोया ...नमनीय है ....!!
Pyaasa Sajal said…
sabse zyada jis baat ne prabhavit kiya wo hai aapke shabdo ka chayan...
M VERMA said…
bahut achchha laga.
बहुत सुन्दर। लिखती रहिए।
सफ़ेद रंग को पा लेने की आरजू करती चली जा रही हूँ मैं
ये कैसी दुविधा है, कैसा फ़साना है

ak achi bhavavykti.
Pyaasa Sajal said…
I read many of ur earlier compositions..u are really good...aajkal likhne ki freqency zara kam kar di hai aapne??...

keep wriitng..keep sharing
bahut sundar mitr;

aapki bahut si kavitayen padhi ..

is kavita ko padhkar dil ek alag se ahsaas me chala gaya ..

behatreen lekhan . yun hi likhte rahe ...

badhai ...

dhanywad.
vijay

pls read my new poem :
http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html
है मंजिल कहाँ , कहाँ ठिकाना है, कुछ ख़बर नही
बस
सूखे पत्ते की तरह हवा में बहती चली जा रही हूँ मैं
... bahut khoob, prabhaavashaali abhivyakti !!!!
ARVI'nd said…
bahut khoob...bahut achha likha hai aapne
amarjeet kaunke said…
do din ki zindgai me kitne khalal pade......amarjeet kaunke

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दासी

तेरे चरणों की दासी हूँ
करो कृपा हे प्रभू
तेरे दरस की प्यासी हूँ

"मैं" ना रहा अब कुछ नहीं शेष
तेरी कृपा से प्रभू
दासी ने पाया गुरु नरेश

राम नाम ही अौषध है
तेरा सुमीरन हे प्रभू
अात्मा का पोषण है

वाटिका का तू सुन्दर फूल
तेरा हर अादेश प्रभू
सर आँख पर है क़ुबूल

नाम ख़ुमारी चढ़े दिन रैन
प्रभू तेरे दर्शन को
तरसे मेरे दोनों नैन

राम रस से सदा रहूँ लिप्त
कृपािनधान प्रभू
यही चाहे दासी तृप्त

अरमाँ

खुश हुआ है बहुत अंतर्मन
पर कहीं गहरे अंतस में
तीव्र उदासी भी है
नाच उठा है तन बदन
पर कही ख्वाबों की गली में
अखंड ठेहराव भी है
आशाओं से भर गया है मन
पर कहीं किसी धमनी में
अजीब सा खालीपन भी है
भानू की रोशनी से भरपूर है गगन
पर कहीं किसी कोने में
स्याह अँधेरा भी है
वर्षा की बूंदों से धरा है मगन
पर कही किसी कूचे में
बंजर सूखापन भी है
खुशियों ने थाम लिया है दामन
पर कहीं किसी रिश्ते में
नासूर गम के बादल भी हैं
शायद  इसी का नाम ज़िन्दगी है
हा इसी का नाम ज़िन्दगी है


A Tribute

I love, when you talk about me
as, it feels that I am worth being with you.

I love, when you walk with me
as, it feels that I am going in a right direction.

I love, when you ask me to do things for you
as, it feels that I can perform things in a better way.

I love, when you eat with me
as, it feels that I am having Great God's blessings with me.

I love, when you take my name in front of 100 people
as, it feels that I am special among them.


-- Thanks for being with me today and always --