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ग़ज़ल

चले आए हैं तेरे दर पे कि
आज जाने कि जल्दी नहीं

किसी कि नजरों का इंतज़ार बनें कि
आज हमारे घर कोई नहीं

हैं भटक राहों में दर बदर रहें कि
आज मयखाने में प्यास बुझती नहीं

हो गया है याराना अन्धकार से कि
आज दिल-ऐ-चिराग ले रोशनी होती नहीं

अलफ़ाज़ बेकरार हैं होने को नज़म तरस के कि
आज सुरों कि बरसात होती नहीं

झुलस उठा है अंतर्मन ऐ "तृप्त" कि
आज बरखा भी दामन भिगोती नहीं


Comments

kshama said…
झुलस उठा है अंतर्मन ऐ "तृप्त" कि
आज बरखा भी दामन भिगोती नहीं
Aah! Manki ghutan pratibimbit ho rahi hai...!
Udan Tashtari said…
बहुत उम्दा!
चले आए हैं तेरे दर पे कि
आज जाने कि जल्दी नहीं

वाह ! बहुत सुन्दर !
nil said…
Bautifully written, as always.
:)

and mai aaj kal aapko mere blog mein kyu nahi dekhti?
:(
boletobindas said…
सुभानअल्लाह..बस औऱ क्या कहें....
सुन्दर .....बहुत सुन्दर ....
वाह.. वाह... वाह !
अलफ़ाज़ बेकरार हैं होने को नज़म तरस के कि
आज सुरों कि बरसात होती नहीं
bahut hi khoobsurat rachna .
ग़ज़ल.'.क्या कहूँ' ? अच्छी लगी.
Parul said…
very nice..keep it up
बहुत खूबसूरत गज़ल.....और तसुवर-ऐ यार बहुत पसंद आई...
Tripat "Prerna" said…
Sunderta dekhne waale ki aankhon mein hoti hai....
\bahut bahut shukriya aap sabho ka ki aapko meri rachna acchi lagi :)
Bikramjit said…
Beautiful .. silly will be those who wud say otherwise ... really enjoyed reading .. my hindi is not that great but still enjoyed :)
Bahut hi achha likha hai aapne.
aapke blog per aakar dil khus ho gaya.
Bahut hi achha likha hai aapne.
aapke blog per aakar dil khus ho gaya.
Bahut hi achha likha hai aapne.
aapke blog per aakar dil khus ho gaya.
Ashish (Ashu) said…
आप का धन्यवाद इन सुंदर गजलो को हम तक पहुचाने के लिये
Indrajit said…
brilllaint. it somehow reflects my present state. kp going. :)
Mr Happy said…
aap aur aapki gazal, mast lagi :)
Ankit said…
nothing much to say !!!
excellent is the word !!!

if there wud have been a word as excellentest i wud have given it to you !!

it rocks !!
Tripat "Prerna" said…
bahut bahut shukriya aap sabho ka.. :)
चले आए हैं तेरे दर पे कि
आज जाने कि जल्दी नहीं....

ਬਹੁਤ ਵਧੀਆ ਜੀ....

ਜੇ ਆਪਾਂ ਇਉਂ ਕਹਿ ਲਈਏ....
ਬੈਠੇ ਹਾਂ ਤੇਰੇ ਦਰ 'ਤੇ
ਡੇਰਾ ਲਾਈ....
ਜਾਣ ਦੀ ਕੋਈ ਕਾਹਲ਼ੀ ਨਹੀਂ....
ਜੀ ਭਰ ਕੇ ਤੱਕ ਲੈਣ ਦੇ ...
ਝਾਕਿਆਂ ਨਾਲ਼ ਭਰ ਲੈਣ ਦੇ ਝੋਲ਼ੀ ...
बहुत खूबसूरत गज़ल....
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..
आप जाने को कहेंगी भी तो हम यही कहेंगे....
आज जाने की जिद ना करो....
खूबसूरत!
बहुत सुन्दर कल्पना और कृति
viddhi said…
bahut hi khubsurat ....
apka likhne ka tareeka hume pasand aya ...

bohat dino baad kuch naya dekhne ko mila ...

:)

choti si kavita mein bohat kuch keh gae aap ..... sunada kavita
boletobindas said…
बढ़िया लिखा है आपने। गुनगुना रहा हूं....क्या करुं इतनी बढ़िया आवाज नहीं है वरना रिकॉड करके आपको सुनाता कि कितने बढ़िया बोल लिखे हैं आपने
boletobindas said…
बढ़िया लिखा है आपने। गुनगुना रहा हूं....क्या करुं इतनी बढ़िया आवाज नहीं है वरना रिकॉड करके आपको सुनाता कि कितने बढ़िया बोल लिखे हैं आपने
झुलस उठा है अंतर्मन ऐ "तृप्त" कि
आज बरखा भी दामन भिगोती नहीं..बहुत सुन्दर पंक्तियाँ. .. वाह.. बहुत खूब
viddhi said…
all have is one word ...excellent...

magical i should say.. ..!
keep writing ..tc !
Puninagpal said…
great,,, what a fine piece of work..!!

feel so glad to read such a nice composition..!!

Regards,
Puneet

http://puninagpal.blogspot.com/p/mehfil-e-shayari.html

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अनुभूति

आज अचानक
कहीं गहरे अंतस में
उसी मंदिर  कि घंटियाँ फिर से बजने लगी हैं
और आरती सुनाई देने लगी है 

जब मैं और मेरी सहेलियाँ
छुट्टी वाले दिन
बड़े ही चाव से बन-ठन के
मंदिर जाया करती थी
हर शाम घंटी बजने का 
इंतज़ार किया करतीं थीं

सच...
आज़ाद परिंदा था मन उन दिनों
जिसकी उड़ान की
कोई सीमा नहीं थी,
कोई निश्चित दिशा नहीं थी

बिल्कुल आज़ाद, बंदिशों रहित,
निर्मल, स्वच्छ आकाश में
उड़ान भरने को सदा तत्पर...
खुले-आम जी भर के जीने वाला
चित...
जिसका कही कोई मुकाबला ही नही था...

लेकिन आज अगर ढूंढने भी निकलूँ,
तो भी नहीं मिलता वो मंदिर
कान मानो तरस रहें हों आरती की आवाज़ को...

सहेलियों के भी धरौंदे टूटते समय न लगा
और कच से टूट कर बिखर गए

अब कोई राहगीर नहीं रहा राह में
और मन....
मन जैसे प्रत्येक क्षण
करहा रहा हो...छटपटा रहा हो...
एक बार फिर से उसी गगन को
चूमने को तरस रहा हो...

मगर अफ़सोस
उडारी भर न सकेगा
इन बंदिशों, बेड़ियों, समाज की खोखली जंजीरों में
बंध कर जो रह गया है

न जी सकेगा, न मर सकेगा
बस यूँ ही
घुट-घुट कर आहें भर कर रह जाएगा...

और इंतज़ार करेगा
एक नई प्रभात का
वाटिका में नई कोपलों के फूटने का
एक सुन्द…

दासी

तेरे चरणों की दासी हूँ
करो कृपा हे प्रभू
तेरे दरस की प्यासी हूँ

"मैं" ना रहा अब कुछ नहीं शेष
तेरी कृपा से प्रभू
दासी ने पाया गुरु नरेश

राम नाम ही अौषध है
तेरा सुमीरन हे प्रभू
अात्मा का पोषण है

वाटिका का तू सुन्दर फूल
तेरा हर अादेश प्रभू
सर आँख पर है क़ुबूल

नाम ख़ुमारी चढ़े दिन रैन
प्रभू तेरे दर्शन को
तरसे मेरे दोनों नैन

राम रस से सदा रहूँ लिप्त
कृपािनधान प्रभू
यही चाहे दासी तृप्त

सिसकते रिश्ते

काश की ऐसा हो पाता
कि शाखों से टूटे पत्ते
फिर से उन्ही टहनियों पर
लहरा पाते
काश की ऐसा होता
कि  टूटे हुए तारे
फिर से विशाल आकाश में
जगमगा पाते
काश की ऐसा होता
कि रिश्तों के टूटे हुए तार
फिर से अपने सांचे में ढल पाते
खिलखिला पाते
काश....
मगर ये हो न पाएगा
वक़्त का पहिया तो चलता ही
चला जाएगा
और अच्छा है की न  हो पाएगा
गुजरते समय के साथ
अहसास भी गुजर गए
ज़िन्दगी के रंगमंच पर
आज एक नया किरदार उभर कर आया है
जो बेफिक्र है , जो ताज़ा है
जो हिम्मती है, जो निडर है
जो ताक़तवर है, जो दमदार है
जो अति सुन्दर है , जो तृप्त है...