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दिले-बयाँ

नैन चक्षुओं को खुलना सिखा मौला,
ज़र्रे-ज़र्रे में तेरे अक्स को देखना सिखा मौला

कर्णों से सुनना सिखा मौला,
कौने -कौने में तेरे नाम कि अपार चर्चा सुनना सिखा मौला

नथनों से सूंघना सिखा मौला,
सृष्टि के कण-कण में बसी तेरी मदमस्त सुगंधी में डूबना सिखा मौला

कंठ को तेरी उस्तत करना सिखा मौला,
हर लफ़्ज में तेरा ज़िक्र हो ऐसा कोई नायाब गीत सिखा मौला

हस्त से लिखना सिखा मौला,
कविता के प्रत्येक शब्द में तेरे नाम का गुण-गान करना सिखा मौला

उदर कि क्षुदा को तड़पना सिखा मौला,
तेरे ध्यान कि ऊर्जा से भूखे पेट को भरना सिखा मौला

क़दमों को चलना सिखा मौला,
सकल द्वार को छोड़ कर तेरे नूरे-द्वार पर रुकना सिखा मौला

कामिनी को ख़सम होना सिखा मौला,
जन्म-मरण के चक्रव्यूह से अब तो विश्राम करना सिखा मौला

Comments

Mr Happy said…
mujhe bhi preerna jaise likhna sikha maula :)

wonderfully put up........
सच्चे और बहुत अच्छे मनोभाव
बहुत सुन्दर भावनाएं !
Anonymous said…
beautiful.
nil said…
Beautiful. Simply beautiful.
Parul said…
saral..sahaj...bhawanayen...aur ek sundar kasak..so nice
Vivek VK Jain said…
randomly landed here......nice blog.
beautiful poem.
gaurtalab said…
aaj agar aap comment aakar na deti to shayad main kab yaha pahuchta...nice blog aur bahut umda rachnaye.thanks to visit me.
हर लफ़्ज में तेरा ज़िक्र हो ऐसा कोई नायाब गीत सिखा मौला

बहुत सुन्दर....!!
बहुत शानदार... भाव.....
Ankit said…
beautiful !!
Awesum !!
Mind Blowing !!
jhakassss !!!
Aur kya likhun !!!

Itz out of this world !!!

Happy Blogging and take care !!!
सुन्दर लेखन .....

नैन और चक्षु ....दोनों का अर्थ एक ही है ...यदि एक ही शब्द का प्रयोग किया जाता तो बेहतर होता ..
Hardeep said…
सुन्दर भाव.....
sandhyagupta said…
भक्ति रस में डुबो दिया.शुभकामनायें.
बेहद सुंदर रचना। बार बार पढऩे को जी चाह रहा है।
बहुत अच्छी प्रस्तुति।
Babli said…
बहुत सुन्दर लिखा है आपने ! उम्दा प्रस्तुती!
मित्रता दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ!
Raindrop said…
beautiful...i find the style to be quite unique. in a sense...use to shuddha hindi words and urdu in the same sentence with ease. only a person expert in both can do that.
कंठ को तेरी उस्तत करना सिखा मौला,
हर लफ़्ज में तेरा ज़िक्र हो ऐसा कोई नायाब गीत सिखा मौla
bahut hi sundar .
बेहद सुंदर रचना।
बहुत सुन्दर लिखा है आपने ! उम्दा प्रस्तुती!
maine aapko virender ji ke blog se follw kiy ahai..

bahut hi sunder blog hai..
Main zyaada nahin maangtaa!!!!
Sahaj, Saral aur Khoobsoorat!
आपकी टिपण्णी के लिए आपका आभार ...अच्छी कविता हैं...बहुत अच्छी .
PN Subramanian said…
बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल. आभार.
anjana said…
सुन्दर भाव..
viddhi said…
simply beautiful !
viddhi said…
beautifully written ! :)

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अनुभूति

आज अचानक
कहीं गहरे अंतस में
उसी मंदिर  कि घंटियाँ फिर से बजने लगी हैं
और आरती सुनाई देने लगी है 

जब मैं और मेरी सहेलियाँ
छुट्टी वाले दिन
बड़े ही चाव से बन-ठन के
मंदिर जाया करती थी
हर शाम घंटी बजने का 
इंतज़ार किया करतीं थीं

सच...
आज़ाद परिंदा था मन उन दिनों
जिसकी उड़ान की
कोई सीमा नहीं थी,
कोई निश्चित दिशा नहीं थी

बिल्कुल आज़ाद, बंदिशों रहित,
निर्मल, स्वच्छ आकाश में
उड़ान भरने को सदा तत्पर...
खुले-आम जी भर के जीने वाला
चित...
जिसका कही कोई मुकाबला ही नही था...

लेकिन आज अगर ढूंढने भी निकलूँ,
तो भी नहीं मिलता वो मंदिर
कान मानो तरस रहें हों आरती की आवाज़ को...

सहेलियों के भी धरौंदे टूटते समय न लगा
और कच से टूट कर बिखर गए

अब कोई राहगीर नहीं रहा राह में
और मन....
मन जैसे प्रत्येक क्षण
करहा रहा हो...छटपटा रहा हो...
एक बार फिर से उसी गगन को
चूमने को तरस रहा हो...

मगर अफ़सोस
उडारी भर न सकेगा
इन बंदिशों, बेड़ियों, समाज की खोखली जंजीरों में
बंध कर जो रह गया है

न जी सकेगा, न मर सकेगा
बस यूँ ही
घुट-घुट कर आहें भर कर रह जाएगा...

और इंतज़ार करेगा
एक नई प्रभात का
वाटिका में नई कोपलों के फूटने का
एक सुन्द…

सिसकते रिश्ते

काश की ऐसा हो पाता
कि शाखों से टूटे पत्ते
फिर से उन्ही टहनियों पर
लहरा पाते
काश की ऐसा होता
कि  टूटे हुए तारे
फिर से विशाल आकाश में
जगमगा पाते
काश की ऐसा होता
कि रिश्तों के टूटे हुए तार
फिर से अपने सांचे में ढल पाते
खिलखिला पाते
काश....
मगर ये हो न पाएगा
वक़्त का पहिया तो चलता ही
चला जाएगा
और अच्छा है की न  हो पाएगा
गुजरते समय के साथ
अहसास भी गुजर गए
ज़िन्दगी के रंगमंच पर
आज एक नया किरदार उभर कर आया है
जो बेफिक्र है , जो ताज़ा है
जो हिम्मती है, जो निडर है
जो ताक़तवर है, जो दमदार है
जो अति सुन्दर है , जो तृप्त है...

दासी

तेरे चरणों की दासी हूँ
करो कृपा हे प्रभू
तेरे दरस की प्यासी हूँ

"मैं" ना रहा अब कुछ नहीं शेष
तेरी कृपा से प्रभू
दासी ने पाया गुरु नरेश

राम नाम ही अौषध है
तेरा सुमीरन हे प्रभू
अात्मा का पोषण है

वाटिका का तू सुन्दर फूल
तेरा हर अादेश प्रभू
सर आँख पर है क़ुबूल

नाम ख़ुमारी चढ़े दिन रैन
प्रभू तेरे दर्शन को
तरसे मेरे दोनों नैन

राम रस से सदा रहूँ लिप्त
कृपािनधान प्रभू
यही चाहे दासी तृप्त