Monday, December 28, 2009

प्रशन चिन्ह?

क्या कारण है की आजादी के बासठ सालों के बाद आज भी भारत वर्ष की गिनती उन्नत देशो में न हों कर उन्नतिशील देशो में की जाती है? क्यों आज भी एक आम आदमी को उसके अधिकारों से जानभूझ कर वंचित रखा जाता है? क्यों एक साधारण व्यक्ति अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल करना ही नहीं चाहता? क्यों कोई अपने अधिकारों के लिए अपनी आवाज़ उठाना ही नहीं चाहता? क्यों आज भी दिन हो या रात, एक लड़की सड़क पर अकेली जाने से कतराती है? क्यों यहाँ के नागरिक खुद को सुरक्षित नहीं समझते? क्यों एक साधारण, मजबूर, गरीब आवाज को सियासत के भौंपू के आवाज के तले, उसे उठने से पहले ही दबा दिया जाता है? आज कहाँ गई उनकी इंसानियत या उनकी जिम्मेवारी जिन्होंने एक सुन्दर, विशाल, उन्नत समाज का निर्माण करने की शपथ ग्रहण की थी? क्यों आज का समाज अपने कर्तव्यों के प्रति अपना उत्तर्दायितव नहीं समझता, या सरल शब्दों में कहूँ की समझना नहीं चाहता? क्यों इस देश का ८०% न्याय भी अन्याय है? क्यों आज रह चलते किसी भी मुसाफिर से चाक़ू की नोंक पर उस से सब कुछ सरेआम छीन लिया जाता है और बदले में प्रशासन और स्वयं समाज हाथों में चूडिया डाल कर सहायता करने की बजाये तमाशा देखते रहेते है? क्यों एक बेक़सूर को कसूरवार न होते हुए भी बड़ी ही निर्ममता से कठौर सजा सुना दी जाती है, और उसे एक बार भी अपनी सफाई पेश करने का मौका नहीं दिया जाता? फिर क्यों हज़ारो किताबें लिख डाली है न्याय की, यदि कोई उसे पड़ना नहीं चाहता, और जो पड़ना चाहता है उसे उसका इस्तेमाल नहीं करने दिया जाता? क्यों दीमक की तरह चिपक गया है ये अपराध देश को और धीरे धीरे खोखला किये जा रहा है इसे? क्यों कोई सचाई की तरफ कदम नहीं बढाना चाहता? क्यों आज अन्याय की इमारत इतनी ऊँची और मजबूत हो गई है की न्याय को वहा पहुँचने से पहले ही दबोच लिया जाता है? मदद, परोपकार, अनुशासन, विश्वास; जैसे शब्दों का तो कोई मूल्य नहीं रह गया है आज. चीथड़े उड़ा दिए गए है इस शब्दों के मायनो के. आज हर गली मोहल्ले में सब्जी तरकारी के भाव बिकतें है लोगो के ज़मीर और ख़ुशी ख़ुशी बिकतें है. सच में पट्टी बंधी है न्याय की मूर्ती पर, और इतनी ज़ोर से बंधी है की यदि कोई इसे खोलना भी चाहे तो हाथ काट दिए जाते है. सच की आवाज को गूंजने से पहले ही उसका गला दबा कर अंतिम संस्कार कर दिया जाता है. 
कौन करेगा उन्नति, कौन बनाएगा नए और सुन्दर रास्ते, कौन करेगा सहायता; जब रक्षक ही सबसे बड़ा भक्षक बन चुका है?

Wednesday, December 2, 2009

Dreams

When the whole world sleeps,
At the midnight air whispers in my ear.
A beautiful ball of white light in the sky,
Throws its charming rays into my eyes.
I usually try to see a glimpse of yours,
Into the mirror or in shadow of mine.
My twin eyes pretend to see you,
I am always blue without you.
I can feel and smell your senses,
As my soul is one with you.
And on all the occasions,
I want to be with you.

I Love You!

Thursday, October 8, 2009

आरजू


दिन, महीने, साल
यु ही गुजरते चले गए
और मैं, देखती रह गई
अपने साथ साथ हजारो रंग
हजारो सपने बिखेरते रहे
और मैं, एक भी सपने का रंग न बटोर पाई
वक्त का कठोर पहिया किसी के लिए
न कभी रुका था, न कभी रुका है
और मैं, समय की रफ़्तार पकड़ने की कोशिश करती रही
सावन, बरखा, मेघ, सतरंगी
सब आते रहे, जाते रहे
और मैं, बुत बनी देखती रही
ज़िन्दगी अपने रंगमंच पर जाने कितने
किरदार निभाती रही
और मैं, ख़ुद के अस्तित्व के धागों को बुनती रही
सफर तो जहा से शुरू किया था
आज वही आकर ख़तम हो गया
और मैं, मंजिल का ठिकाना ढूँढती रही...

Thursday, August 27, 2009

दृष्टिकोण

बड़े सुहाने दिन थे वो जब ज़िन्दगी
सिर्फ़ मेरे लिए, किसी हसीन अफ़साने से कम न थी
जब उगते हुए सूरज की हर किरण
सिर्फ़ मेरे लिए, अपने साथ हजारों रंग लिए आती थी
जब पड़ोस में मुर्गा सुबह सुबह
सिर्फ़ मेरे लिए, जोर से बांग देता था
जब बागीचे का फूल फूल
सिर्फ़ मेरे लिए, खुशबू बिखेरा करता था
जब गर्मी की तेज धुप को चीरते हुए बादल
सिर्फ़ मेरे लिए, जी भर कर बरसते थे
जब खुले निर्मल आकाश में इन्द्रधनुष
सिर्फ़ मेरे लिए, रंगों की बौछार करता था
जब गली में खेलते हुए बच्चों में से मेरी माँ
सिर्फ़ मेरे ही चेहरे पर, खुशी को नाचते हुए देखा करती थी
सच...ये कायनात अज़ब सुंदर थी
जब मैं बच्ची थी...

Wednesday, August 5, 2009

वही डगर...

आज क्यों बदली बदली सी है
वही राहे...
जो कभी अपनी हुआ करती थी
लगाव तो आज भी उतना ही है
फिर क्यों अपनी हो कर भी डगर अनजानी सी लगती है
आज वही मेघ छाए है गगन में
फिर क्यों बरखा का पानी बेगाना सा लगता है
वही मौसम, वही रुत, वही आलम है
फिर क्यों आज सच भी अफसाना सा लगता है
खुशिया आज भी बाहे फैलाए स्वागत कर रही है
फिर क्यों इक अनजाना सा भय खाए चला जा रहा है
या कुछ नही...ये डगर है उस तक पहुँचने की
शायद इसी लिए राह की हर सीडी परीक्षा बनती चली जा रही है...

Friday, July 10, 2009

एक बीमार सोच

पुरूष और नारी मिलकर समाज की रचना करते है। समाज के निर्माण के लिए जितना पुरूष जिम्मेवार है उतनी ही नारी भी। फिर क्यों सदियों से नारी अपने अरमानो को सूली से टंगती हुई आ रही है, क्यों सदा से ही नारी को तुच्छ समझा जाता है। प्रकृति ने भी नारी को पुरूष से एक कदम आगे रखा है...संतान पैदा करने का सामर्थ्य प्रदान किया है। आज विधान सभा में नारी को ३३% आरक्षण देने की बात करते है, आख़िर क्या साबित करना चाहते है, की ये नारी का सम्मान कर रहे है, उसे आगे आने का मोका दे रहे है। अरे ईश्वर ने भी सृष्टि की रचना के लिए नारी और पुरूष का ५०% चुना है...फिर क्यों ये पुरूष प्रधान समाज नारी को उसका ५०% अधिकार नही दे सकता?
मगर ये क्या जाने नारी की मनो - स्तिथि को। हर रोज , हर कदम पर जाने किस - किस चुनौती का सामना करती है। दिन रात इक नई कसौटी पर मुस्कुराते हुई तराजू में तौलती है ख़ुद को। नारी के जीवन पर चार लफ्ज़ लिख डाले और समझ लिया की जान गए इसे अच्छी तरह..इसी भ्रम में है वो लोग , जो ये दावा करते है की वो इसकी तकलीफ से रु-ब-रु है। इतना आसान नही है नारी के अस्तित्व को जानना और समझना। यदि नारी को समझना है, उसे सही शब्दों में पिरोना है, तो ख़ुद नारी का जीवन जी कर देखो। (बहुत आसान है लिखना- की नारी जीवन में बहुत से किरदार निभाती है और सफल भी होती है)। नारी की सहेनशीलता को शब्द नही दिए जा सकते। ईश्वर ने जाने किस मिटटी से बनाया है इसे, की हर तूफ़ान को इक नई चुनौती समझ कर , उसे जान कर, उसे स्वीकार कर, चुपचाप अपने अन्दर समेट लेती है। कोई क्या जाने की ये अन्दर से कितनी डरी हुई होगी...कभी किसी ने भी इसकी मनो-स्तिथि को समझने की कोशिश ही नही की। यदि वास्तव में कोई इसे समझना चाहता तो इस पर भिन्न - भिन्न प्रकार ki कविताए लिखने की बजाए इसके अस्तित्व की रक्षा करने में जुटा हुआ दिखाई देता। अफ़सोस सिर्फ़ और सिर्फ़ इसी बात का है की इस पर दया का भाव दिखाने वाले तो करोडो मिल जाते है, लेकिन इसके लिए, इसके अधिकार के लिए कोई भी आगे आने को तैयार नही है॥
स्वार्थी है आज का समाज। यह पुरूष प्रधान समाज एक औरत को कभी भी उन्नति करता हुआ नही देख सकता। आज देश में कितनी है ऐसी प्रतिभाशाली औरतें है जो लोक लाज के भय से अपने अपने घरों में छुपी बैठी है।
समाज लोगो से बनता है - हम तुम जैसे लोगो से...लेकिन आज लोगो की सोच बेईमानी हो गई है। बेईमान लोगो से बना हुआ आज का समाज खोखला हो चुका है। एक ऐसा समाज जिसके तत्व न तो स्वयम ही उन्नति करना चाहते है और न दूसरो को करते देख सकतें है।
स्वर्गवासी श्री आंबेडकर जी ने सही कहा है - "भारत भाग्य विधाता"। भारत का भाग्य उस विधाता के हाथों में ही है..लेकिन इश्वर भी उसी की सहायता करते है जो स्वयं अपनी सहयता करना चाहता है ..और यहाँ तो सहायता करने की बजाए एक दूसरे के अस्तित्व को जी जान से मिटाने में लगे है...

Saturday, May 30, 2009

द्वन्द

अपने ही विचारों की दल दल में
कहीं गुम सी होती चली जा रही हूँ मैं
डर है कहीं ख़ुद के ही अस्तित्व को
न खो बैठूं मैं
पता नहीं ये डगर किस ओर ले जा रही है
या ख़ुद इसी राह से लिपटी चली जा रही हूँ मैं
है मंजिल कहाँ , कहाँ ठिकाना है, कुछ ख़बर नही
बस
सूखे पत्ते की तरह हवा में बहती चली जा रही हूँ मैं
मलिन हो गया है अंतर्मन या नही सुनाई देती आत्मा की आवाज़
आज उज्जवल दृश्य नही देख पा रही हूँ मैं
मन के पर्दे पर अठखेलियाँ करते भिन्न भिन्न रंगों में से
सफ़ेद रंग को पा लेने की आरजू करती चली जा रही हूँ मैं
ये कैसी दुविधा है, कैसा फ़साना है
की लोग कहतें है
आंखों से ही सब बयान करे जा रही हूँ मैं

Thursday, April 30, 2009

किस और...किसकी तरफ़....और क्यों ???

आज एक बार फ़िर से
वही दौर आया है...
वो फ़िर से हर गली मुहल्ले में
अपनी आवाज़ घर घर बिखेरते
नज़र आने लगे...
फ़िर से वही नकली, झूठी
दिल को दिलासा देने वाली दलीलें
शहर के हर मोड़ पर सुनाई देने लगी....
दलील है..वोट दो...
उसे नही...मुझे दो...
सोच में पढ़ गई हू
किसे दू और किसे नही....
कौन साचा है कौन झूठा...
कौन देश की उन्नति के लिए सहभागी है
और कौन नही...
अपने ही विचारों में उलझ सी गई हू...
इस जन्तो जेहेन में फंस गई हू
न ख़ुद के साथ और न ही
समाज के साथ
न्याय नही कर पा रही हू
वो कहतें है आपका वोट कीमती है...
पर सबको पता है
परदे के पीछे यही वोट बिकता है...
आम आदमी को कौन पूछता है
उन्हें तो सिंघासन चाहिए
और उन्हें मिल भी जाएगा...
आम आदमी से ही खरीदा हुआ
झूठे दिलासे दे कर
सिंघासन....
हैरान हू
की हम सच में अभी तक
आजादी के बासठ सालों के बाद भी
आँखें खोल कर सो रहे है....
या कभी जागना चाहते ही नही...

Tuesday, March 31, 2009

"शौषण"

सच कहा है ..
किसी के लिए कितना भी कर लो,
कम पढ़ ही जाता है...
मैंने पूरी जी जान लगा दी
अपना लक्ष दाव पर लगा दिया
कोई कसर नहीं छोडी
किसी को शिकायत का मौका भी नहीं दिया
ज्यादा नहीं चाहा था मैंने
तमन्ना, तमन्ना ही रह कर
कही दिल के किसी कोने में दब गई
कहाँ हुई गलती,
कहाँ हुई भूल,
की
फूल पाने की आरजू थी
और दामन में गिरे तो सिर्फ
बेवफाई के कांटे
नफरत की झंझोड़ देने वाली आंधी...
ऐ खुदा
बदल दे हालात मेरे...
अब ये आवाज़ नहीं निकलती दिल से
हिम्मत दे अपने चाहने वालो को
की तेरे ही बन्दों से मिली हुई
नफरत को
तेरा आशीर्वाद समझ लू...

Sunday, March 22, 2009

"राहें"

आज ज़िन्दगी किस राह पर
ले जा रही है
जो कभी सोचा ना था
वो करवा रही है
और जो सोचा था
उसका तो
नामो निशाँ ही नही है
सावन भी बरस कर चल दिया
और कलि पर भी
पूरा यौवन आ गया
कायनात ने अपना नियम
अदा कर दिया
लेकिन
मेरा रास्ता क्यों बदल दिया
जो नही कर सकती थी
वो भी करवा दिया
और भरपूर करवाया की
शिकायत भी करने की
गुंजाइश न रही
ये "उसकी" कृपा थी
या
मेरा करम
की अपने "नसीब" से
मुझे "इशक" करवा दिया

Sunday, March 15, 2009

मिलन

मेरी इबादत रंग ले आई
आज चारो तरफ़ प्रेम की कलियाँ मुस्काई
मेघ भी जम कर बरसे
आज इन्द्रधनुष ने भी भरपूर रंग दिखाए
चांदनी जी भर के बिखेरी चाँद ने
आज सिमट गया हर भंवरा कलि में
महक गई दिशाए संदली सी खुशबू से
आज पूरी हो गई हर तमन्ना दीदार - ऐ - यार से
जुदाई के काले बादलों की छठा हट गई
आज नदी सागर से जा कर मिल ही गई
नाच उठे अनगिनत मौर दिल के बागीचे में
आज पाया ख़ुद को उनकी बाहों में
हर पल थी इसी पल के इंतज़ार में
आज हो गई "पूरी" उनके प्यार में

Sunday, February 22, 2009

वक्त की भी अजीब कशमकश है....

वक्त की भी अजीब कशमकश है
की वो है तो हम नही और
जो आज हम है तो उनका निशाँ गुम है
वक्त की भी अजीब कशमकश है

जानता है दीवाना दिल की वो नही है इसकी मंजिल
फिर भी उसी रह पर चलने का शौकीन है
वक्त की भी अजीब कशमकश है

न कोई गिला न शिकवा है उनसे
की वो तो हाले - दिल से बेखबर है
वक्त की भी अजीब कशमकश है

वो सादगी में बिता गए हजारो लम्हे
हर पल में मानो ज़िन्दगी जी ली हो हमने
वक्त की भी अजीब कशमकश है

मूँद ली थी आँखें हमने तो उनके इंतज़ार में
पर दगाबाज़ सांसें बह रही है उनकी यादों के भंवर में
वक्त की भी अजीब कशमकश है

न हो सके हम उनके फिर भी है इक तस्सल्ली
की होगा मिलन रूह का रूह से अगले जहान में
वक्त की भी अजीब कशमकश है...

Friday, February 20, 2009

"कसक"

वो आए,
और कुछ इस कदर आए की
उनका आना पता भी न चला
वो लाए अपने साथ हजारो सपने,
और चुपके से सज़ा दिए आँखों में
वो लाए बिखेरते अनगिनत खुशियाँ चारो तरफ़,
और भर दिया सूना दामन
वो लाए साथ अपने मेघ प्रेम के,
और बरस कर चल भी दिए
अभी तो आने की आहट भी नही हुई ,
और वो चल दिए
वो गए कुछ इस तरह की,
सपने टूट कर आँखों से बह गए
वो गए कुछ इस तरह की,
खुशियों ने भी दामन छोड़ दिया
वो गए कुछ इस तरह की,
नीर बहता चला गया
फरक सिर्फ़ इतना था,
पहले मेघ बरसाते रहे
और अब नैन

Wednesday, February 18, 2009

इंतज़ार

हाँ तुझसे प्रेम है,
जब से मैं हूँ तब से प्रेम है

न जमाने मैं है दम, न ख़ुद तुझमे है ताकत
की बाँध सके बेडिया मेरे कदमो में

दर
दर भटक रहे है तेरे चाहने वाले
लिए आरजू तेरे "दरस" की मन में

तेरी बंदगी ही है अब ज़िन्दगी मेरी
तेरी इबादत ही मेरा जुनून

होगी
तो ख़बर तुझे भी तेरे दीवाने की
फिर क्यों है ये पहरे दरमियान -ऐ - फान्सलों के

सिर्फ़ एक झलक जो दिख जाए तेरी
चल रही है "साँसों" की लड़ी इसी इंतज़ार में

Monday, February 16, 2009

दरस

जाने कब से तुझसे प्यार है,
तू मेरा दोस्त तू ही यार है।
तेरा साथ है तो जीवन वरदान है,
जो तू नही तो मेरी क्या पहचान है।
तेरी याद में गुजरा वक्त ही मेरा जहान है,
तू जमीन तू ही आसमान है।
तू कृपा का सागर अपार है,
बस तेरा "दरस" ही जीवन का आधार है।

Sunday, February 1, 2009

तुझे आना होगा...


है हर पल तेरा इंतज़ार
तुझे आना होगा
बैठीं हूँ नज़रें बिछाए राह पर
तुझे आना होगा
दरस की "कसक" बड़ा दी फान्सलों ने
तुझे आना होगा
कर चुकी हूँ ख़ुद को तबाह तेरे इश्क में
तुझे आना होगा
है यकीन मुझे मेरी इबादत पे
तुझे आना होगा
तुझे आना होगा...

Saturday, January 31, 2009

अर्जी

कही भी ले जा रब्बा तेरी मर्जी,
बस अपनी याद बनाए रखना यही है अर्जी।
हर शकले- सूरत में तुझको ही देखूं,
बरसें मेघ तेरे प्रेम के यही दुआ मांगू।
रहू हर पल 'तर' तेरे नूर की मय में,
है यही आरजू न कभी आऊं होश में।
तू देख ले इक नज़र तो हो जाऊँ ''तृप्त'',
कर चुकीं हूँ समर्पित ख़ुद को तेरे दरबार में।

सैलाब

चक्की के दो पाटो में पिस कर रह गया हू
यह रास्ता जाने कहा ले जाएगा।
न जाने कहा जा कर रुकेगा ये आंसुओं का सैलाब
थमेगा भी या नही कौन देख पाएगा।

Friday, January 9, 2009

बस एक कदम.....

आकाश, पंछी, बादल, दरिया, पर्वत, हवा; हम इन्हे कुदरत केहेतें है, वो कुदरत जो परम पिता परमत्मा ने अपने हाथों से बनाई और सवारी भी है। हम सब इसकी सरहाना करतें है। हम सब इसे सवार कर संजो कर रखना चाहतें है और कही न कही इसे संभाल कर रखने की पूरी कोशिश भी करतें है।
इंसान को भी तो उसी परमात्मा ने बनाया है, फिर क्यों हम इंसान होते हुए भी उसी इंसान के अस्तित्व को मिटाना चाहतें है? फिर आज क्यों इक इंसान दूसरे का दुश्मन बना बैठा है? क्यों कोई किसी की तरक्की नही देख सकता ? कहा , और कब जा कर टूटे गी ये नफरत की दीवार, वो दीवार जो बिल्कुल खोखली होते हुए भी अपनी नींव पर मजबूती से खड़ी है। आज ये दीवार इतनी विशाल हो गई है की इसने इंसान की आँखों में अपनी काली परछाई छोड़ दी है और वो अपने भले और बुरे के बारे में भी सही निर्णय नही ले पा रहा है। आज हर गली मोड़ पर कोई न कोई किसी न किसी का दुश्मन है। में पूछती हूँ कहा गई वो जिम्मेवारी जिसके लिए परमात्मा ने इंसान की रचना की है? दूसरे का भला करना तो दूर आज इंसान ख़ुद को भी भूल चुका है। तेजी से आगे बड़ते हुए ज़माने की बढती हुई जरूरतों ने इंसान को इतना घेर लिया है की इसके पास स्वयम के लिए भी समय नही और न ये समय निकलना चाहता है।
यदि आज इंसानियत का पतन हुआ है तो , इसका कारन भी यह ख़ुद है। अपनी हर तकलीफ, दुःख दर्द के लिए यदि कोई जिम्मेवार है तो वो है सिर्फ़ और सिर्फ़ इंसान। यदि इस पर कोई मुसीबत आ जाती है तो यह दूसरो पर इल्जाम लागने से पहेले इक पल के लिए भी नही सोचता, फिर चाहे वो कोई अपना बहुत प्यारा ही क्यों न हो । स्वार्थी हो गया है आज का समाज।
एक सुंदर स्वस्थ समाज की रचना समझदार और सुलझे हुए लोगो से होती है, जिसका मेल होना आज के ज़माने में मुश्किल ही नही बल्कि नामुमकिन सा होता दिख रहा है। परमात्मा ने अपनी पूरी सरंचना में से सबसे जादा दिमाग, सोच समझ कर सही निर्णय लेने की शक्ति; समाज कल्याण की भावना से इंसान को प्रदान की है। लेकिन इस लालची (मुझे इसे लालची कहेने में तनिक भी संकोच नही है) प्राणी ने उस असीम और पवित्र शक्ति का दुरूपयोग कर अपने मन में हीन भावना रखते हुए , स्वयम और समाज दोनों का नक्षा हिला कर रख दिया है।

समाज हम से है और हम समाज से है, तो क्यों हम अपने ही अस्तितिव को मिटा रहे है? अरे पशु, पक्षी भी अपने उत्तम व्यवहार से स्वयम के अस्तित्व की रक्षा करतें है, तो हमे तो उस कल्याण कारी ने सोचने समझने की शक्ति प्रदान की है। एक दूसरे से ना सही , इन पेड़, पोधों से; पशु, पक्षियों से; कुछ सीख ले और एक निर्मल सोच को जनम दे कर नए लोग , नए समाज की रचना करें। बस एक कदम इंसानियत की और.... कल्याण की और....

Wednesday, January 7, 2009

Ambiguity

It really hurts when you find, that you are absolutely unable to give happiness and satisfaction to those people who loves you and in return you also adore them. But you can't help it, because what nature wants you to do, you are doing the same and the worst part is this that your loved ones don't want you to do it.

Then, What to do, How to react, How to tackle such situations?

It is really a big question mark.

I mean you are not at all going in a wrong direction, you know that you are on the right track and somehow, somewhere they also know that you are not wrong. Only the circumstances are reflecting the negative picture or else I can say that you don't want to see and show the real picture.
I think the negative point is this that, you do not accept the situations. You want everything according to your needs and priorities. Things hurt when you do not take things, the way they really are. The moment you start accepting things, the situations become easier for you and you will be out of it. Situations themselves will help you to solve your problems.

When you give "Him" (The Almighty) a chance to solve your problems, he not only solves it, but also vanish the upcoming tribulations in your life.

Saturday, January 3, 2009

A Tribute

I love, when you talk about me
as, it feels that I am worth being with you.

I love, when you walk with me
as, it feels that I am going in a right direction.

I love, when you ask me to do things for you
as, it feels that I can perform things in a better way.

I love, when you eat with me
as, it feels that I am having Great God's blessings with me.

I love, when you take my name in front of 100 people
as, it feels that I am special among them.


-- Thanks for being with me today and always --